सामाजिक निष्क्रियता
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में परिवर्तन की भावना के ”ास का कारण उस विशिष्ट स्थिति में खोजना होगा, जो उसे भारत में प्राप्त है। वह एक ऐसे सामाजिक परिवेश में रह रहा है जो मुख्यतः हिंदू है। यह हिंदू वातावरण सदैव चुपचाप, किंतु सुनिश्चित रूप से उस पर अपना प्रभाव डाल रहा है और उस पर हावी हो रहा है। शनैः शनैः स्वयं पर पड़ने वाले इस प्रभाव से बचाव के लिए वह हर उस चीज को सुरक्षित रखने पर जोर देता है जो इस्लामी है और यह जांचने-परखने की भी चिंता नहीं करता कि यह मुस्लिम समाज के लिए लाभदायक है या हानिकारक। दूसरी बात यह है कि भारत में मुसलमान एक ऐसे राजनीतिक वातावरण में रह रहे हैं जो मुख्य रूप से हिंदू प्रभुत्व वाला है। वह ऐसा महसूस करता है कि उसका दमन होगा और राजनीतिक दबाव मुसलमानों को दलित वर्ग बना देगा। यही वह चेतना है जिसे जगाकर वह स्वयं को हिंदू वर्ग के सामाजिक और राजनीतिक सोच में विलीन होने से बचता है और जो मेरे विचार में भारतीय मुसलमान को अपने अन्य देशों के सहधर्मियों की तुलना में सामाजिक सुधार के मामले में अधिक पिछड़ा बनाए हुए है। उनकी ताकत सीटों और पदों के लिए सतत संघर्ष में ही लगी रही है, जिसके कारण समाज-सुधार से संबंधित सवालों पर सोचने-विचारने का उनके पास समय ही नहीं बच पाता। और यदि कुछ समय मिलता भी है तो वह सांप्रदायिक तनाव की भेंट चढ़ जाता है, वे इस डर से संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए एकजुट होकर अपनी सामाजिक-धार्मिक एकता को हर कीमत पर अक्षुण्ण रखना चाहते हैं कि हिंदू और हिंदुत्व उन पर हावी न हो जाएं।
भारत के मुस्ल्मि समुदाय में राजनीतिक गतिरोध के बारे में भी यही स्पष्टीकरण दिया जा सकता है। मुस्लिम राजनीतिज्ञ जीवन के धर्मनिरपेक्ष पहलुओं को अपनी राजनीति का आधार नहीं मानते, क्योंकि उनके लिए इसका अर्थ हिंदुओं के विरुद्ध अपने संघर्ष में अपने समुदाय को कमजोर करना ही है। गरीब मुसलमान धनियों से इन्साफ पाने के लिए गरीब हिंदुओं के साथ नहीं मिलेंगे। मुस्लिम जोतदार जमींदारों के अन्याय को रोकने के लिए अपनी श्रेणी के हिंदुओं के साथ एकजुट ही होंगे। पूंजीवाद के खिलाफ श्रमिक के संघर्ष में मुस्लिम श्रमिक हिंदू श्रमिकों के साथ शामिल नहीं होंगे। क्यों? उत्तर बड़ा सरल है। गरीब मुसलमान यह सोचता है कि यदि वह धनी के खिलाफ गरीबों के संघर्ष में शामिल होता है तो उसे एक धनी मुसलमान से भी टकराना पड़ेगा। मुस्लिम जोतदार यह महसूस करते हैं कि यदि वे जमींदारों के खिलाफ अभियान में योगदान करते हैं तो उन्हें एक मुस्लिम जमींदार के खिलाफ भी संघर्ष करना पड़ सकता है। मुसलमान मजदूर यह सोचता है कि यदि वह पूंजीपति
ऽ नेशनेलिटी एंड अदर एसेज।