1. लीग की मांगे क्या हैं? - Page 25

16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

फ्जाति को राष्ट्र के रूप में नहीं मान लिया जाना चाहिए। सच्चाई यह है

कि कोई भी शुद्ध जाति नहीं है और राजनीति को मानवजातीय विश्लेषण

पर निर्भर बनाना एक असंगत कल्पना मात्र हैं। जातीय तथ्य जो कि प्रारंभ

में महत्वपूर्ण होते हैं, उनमें अपना महत्व खोये जाने की एक सतत प्रवृत्ति

होती है। मानव इतिहास अनिवार्यतः ही प्राणी विज्ञान नहीं है। जाति ही सब

कुछ नहीं है, जैसा कि चूहे और बिल्ली के मामलों में होता है।य्

भाषा के बारे में रेनन कहते हैं -

फ्भाषा पुनर्मिलन को आमंत्रण देती है, किंतु यह उनके लिए बाध्य नहीं

करती। यूनाइटेंड स्टेट्स और इंग्लैंड, स्पेनिश, अमरीका और स्पेन एक

ही भाषा बोलते हैं, किंतु वे मिलकर एक राष्ट्र नहीं हैं। इसके विपरीत,

स्विट्जरलैंड की स्थिरता का आधार वह तथ्य है कि उसकी स्थापना उसके

विभिन्न भागों की सहमति से हुई थी, जिनमें तीन या चार भाषाएं बोली

जाती हैं। मनुष्य में भाषा से भी ऊपर एक और चीज है - इच्छा। भाषाओं

की विविधता के बावजूद, स्विट्जरलैंड की संगठित होने की ‘इच्छा’ भाषायी

साम्य की अपेक्षा, जो प्रायः दमन से बनता है, कहीं अधिक महत्वपूर्ण।य्

जहां तक समान देश की बात है, रेनन का तर्क है -

फ्भूमि राष्ट्र-निर्माण के मामले में जाति से ऊपर नहीं है। भूमि, रणभूमि

और कार्य के लिए आधारस्थल उपलब्ध कराती है_ व्यक्ति आत्मा प्रदान

करता है, जिसके कारण उस पवित्र वस्तु के सृजन में मानव ही सब कुछ

है, जिसे जनता कहा जाता है। उसके लिए कोई भी भौतिक स्वरूप यथेष्ट

नहीं हैं।य्

यह दर्शाने के बाद कि जाति, भाषा और देश की राष्ट्र-निर्माण के लिए पर्याप्त नहीं है, रेनन ठोस ढंग से सवाल करते हैं - तो फिर राष्ट्र-निर्माण के लिए और क्या आवश्यक है? उनके उत्तर को उनके ही शब्दों में प्रस्तुत किया जा सकता हैः

फ्राष्ट्र एक सजीव आत्मा है, एक आध्यात्मिक सिद्धांत है। दो चीजें, जो एक

ही हैं, इस आत्मा, इस आध्यात्मिक सिद्धांत का सृजन करती हैं। एक अतीत

से जुड़ी है और दूसरी वर्तमान से। एक है स्मृतियों की समृद्धि विरासत का

समान अधिकार, दूसरी है वास्तविक सहमति, एक साथ रहने की आकांक्षा,

जो अविभाज्य विरासत सौंपी गई है, उसको निष्ठा सहित कायम रखने की

इच्छा। मनुष्य अचानक नहीं आता। व्यक्ति के समान ही राष्ट्र भी प्रयासों के

एक सुदीर्घ अतीत का प्रतिफल हैं। इसीलिए पितृ-पूजन भी सर्वथा वैध है।

हम आज जो कुछ हैं, उसमें हमारे पूर्वजों का ही योगदान है। एक शौर्यपूर्ण