सामाजिक निष्क्रियता
231
के लिए उन्हें हर ऐसी चीज का दमन करना अथवा उसे बट्टठ्ठे-खाते डाल देना होगा जो उनकी एकजुटता में दरार डालती है।
यदि अन्य देशों में मुसलमानों ने अपने समाज को सुधारने का काम शुरू किया है और भारत के मुसलमान ऐसा करने से इंकार करते हैं तो उसका कारण यह है कि अन्य देशों में मुसलमानों का प्रतिद्वंद्वी समुदायों से कोई सांप्रदायिक और राजनीतिक संघर्ष नहीं है, जबकि भारत के मुसलमानों की इससे स्थिति भिन्न है।
III
ऐसा नहीं है कि रूढि़वादिता की यह अंध भावना, जो सामाजिक ढांचे को संवारने की आवश्यकता को ही नकारती है, केवल मुसलमानों पर ही हावी है। हिंदुओं पर भी इसका प्रभाव हुआ है। एक समय हिंदुओं ने यह स्वीकार किया था कि सामाजिक क्षमता के बिना अन्य किसी क्षेत्र में स्थाई प्रगति संभव नहीं है, और हिंदू समाज अपनी कुरीतियों के कारण उत्पन्न भ्रांति के वशीभूत कुशलता की स्थिति नहीं पा सका है, अतएव इन कुरीतियों के उन्मूलन के लिए सतत प्रयास अपेक्षित हैं। इस तथ्य की मान्यता के फलस्वरूप राष्ट्रीय सोशल कांफ्रेंस का भी गठन हुआ था। कांग्रेस का काम जहां देश के राजनीतिक संगठन में कमजोर पहलुओं को स्पष्ट करना था, वहीं सोशल कांफ्रेंस का काम हिंदू समाज के सामाजिक संगठन के दुर्बल तत्वों का निवारण करना था। कुछ समय तक कांग्रेस और कांफ्रेंस ने एक ही संगठन के दो अंगों की तरह काम किया और उनके अधिवेशन भी एक ही पंडाल में संपन्न होते थे। परंतु शीघ्र ही ये दोनों संगठन दो बल बन गए। एक राजनीतिक सुधार दल और दूसरा सामाजिक सुधार दल के रूप में उभरा और दोनों के बीच भीषण विवाद छिड़ गया। राजनीतिक सुधार दल ने राष्ट्रीय कांग्रेस को समर्थन दिया और सामाजिक सुधार दल ने सोशल कांफ्रेंस का साथ दिया। दोनों संगठन दो विरोधी शिविर बन गए। विवाद का मुद्दा यह था कि क्या समाज-सुधार राजनीतिक सुधार से पहले अपेक्षित है? एक दशक तक इन दोनों शक्तियों के बीच संतुलन बना रहा और इस लड़ाई में कोई भी पक्ष विजेता की स्थिति में नहीं आ सका। परंतु यह स्पष्ट हो गया कि सोशल कांफ्रेंस का भाग्य तेजी से उतार पर आ गया है। जिन भद्रजन ने सोशल कांफ्रेंस के अधिवेशनों की अध्यक्षता की, उन्होंने इस बात पर दुःख व्यक्त किया कि शिक्षित हिंदुओं का बहुमत राजनीतिक प्रगति का पक्षधर है और समाज-सुधार के प्रति उपेक्षा भाव अपनाए हुए है_ और जबकि कांग्रेस में भाग लेने वालों की संख्या बहुत बड़ी है और जो लोग इसमें शामिल नहीं होते पर उससे सहानुभूति रखते हैं, उनकी संख्या और भी अधिक है, सोशल कांफ्रेंस में शामिल होने वाले लोगों की संख्या बहुत