10. सामाजिक निष्क्रियता - Page 241

232 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

कम होती है। यह उपेक्षा-भाव और समर्थकों की घटती हुई संख्या की स्थिति बनने के बाद शीघ्र ही उसे स्वर्गीय तिलक जैसे राजनीतिज्ञों की सक्रिय विरोध-भावना भी झेलनी पड़ी। कालांतर में राजनीतिक सुधार के पक्षधरों का दल विजयी हुआ और सोशल कांफ्रेंस का अंत हो गया तथा वह विस्मृत हो गई। ख्1, इसके साथ ही साथ हिंदू समाज से समाज-सुधार की भावना भी विलुप्त हो गई। श्री गांधी के नेतृत्व में हिंदू समाज पागलखाना भले ही नहीं बना, किंतु राजनीति के पीछे तो वह सुनिश्चित रूप से पागल हो ही गया। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और स्वराज की पुकार ने समाज-सुधार का ही स्थान प्राप्त कर लिया, जो कभी हिंदुओं के दिमाग में था। राजनीतिक कोलाहल के धूम-धड़ाके में हिंदुओं को यह भी ध्यान नहीं रहा कि ऐसी कोई बुराई भी उनमें है जिसे दूर किया जाना है। जो लोग इस बारे में सजग हैं, वे यह नहीं मानते कि समाज-सुधार भी राजनीतिक सुधार की तरह ही महत्वपूर्ण है और जब उन्हें उसका महत्व स्वीकार करने पर बाध्य किया जाता है तो वे यह तर्क देते हैं कि जब तक पहले राजनीतिक सत्ता प्राप्त नहीं कर ली जाए, तब तक कोई सामाजिक सुधार नहीं हो पाएगा। वे राजनीतिक सत्ता प्राप्ति के लिए इतने अधिक आतुर थे कि समाज-सुधार के पक्ष में प्रचार करने को भी तैयार नहीं थे, क्योंकि उनके विचार में ऐसा करने के लिए राजनीतिक प्रचार से ही समय और शक्ति की कटौती करनी होगी। श्री गांधी के एक प्रवक्ता ने राष्ट्रवादियों के दृष्टिकोण को स्पष्टतया और समुचित तौर पर व्यक्त किया, जब उसने श्री गांधी को यह लिखाः

फ्क्या आप ऐसा नहीं सोचते कि राजनीतिक सत्ता अर्जित किए बिना कोई

भी बड़ा सुधार हो पाना असंभव है? वर्तमान आर्थिक ढांचे को सुधारना

होगा? राजनीतिक पुनर्निर्माण के बिना किसी तरह का पुनर्निर्माण संभव नहीं

है और मुझे डर है कि परिष्कृत और गैर-परिष्कृत चावल, संतुलित आहार

और इस तरह की अन्य बातें प्रलाप मात्र ही हैं।य् ख्2,

रानाडे के नेतृत्व में संचालित सोशल रिफोर्म पार्टी का अंत हो गया और उसने कांग्रेस के लिए मैदान छोड़ दिया। हिंदुओं में एक अन्य दल उभरा, जो कांग्रेस का ही प्रतिद्वंद्वी है। यह हिंदू महासभा है। इसके नाम से तो कोई भी यही आशा करेगा कि इस संगठन का उद्देश्य हिंदू समाज का सुधार करना है। परंतु ऐसा नहीं है। कांग्रेस से इसकी प्रतिद्वंद्विता का समाज सुधार बनाम राजनीतिक सुधार के मुद्दे से कोई सरोकार नहीं है। कांग्रेस से इसके विवाद का मूल कांग्रेस की मुस्लिम समर्थक नीति में निहित है। इसका गठन मुस्लिम अतिक्रमण के विरुद्ध हिंदू अधिकारों के रक्षार्थ हुआ था और इस नाते इसकी दृष्टि हमेशा राजनीतिक आंदोलनों, गतिविधियों, सीटों और पदों पर लगी रहती है। सामाजिक सुधार के लिए इसके पास कोई समय नहीं है। हिंदुओं का