सामाजिक निष्क्रियता
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एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए उत्सुक संगठन होने के नाते यह संस्था नहीं चाहती कि उसके तत्वों में कोई मत वैभिन्य हो, जबकि समाज-सुधार का काम अपने हाथ में लेने से यह हो सकता है। हिंदू जनता को संगठित करने के लिए हिंदू महासभा सभी सामाजिक बुराइयों के यथावत् बने रहने की पीड़ा झेलने को भी तैयार है। हिंदुओं की एकता हेतु यह 1935 के अधिनियम में परिकल्पित संघीय व्यवस्था का स्वागत करने को तैयार है, भले ही उसमें अनेक खामियां और असमानताएं हों। उसी उद्देश्य से हिंदू महासभा भारतीय रियासतों को भी उनके प्रशासन को यथावत रखते हुए सहने को तैयार है। इसके अध्यक्ष का यह युद्ध-घोष रहा है कि ‘हिंदू रियासतों को मत छेड़ो।’ हिंदू महासभा का यह रवैया मुसलमानों के रवैए से भी अधिक विचित्र है। हिंदू रियासतों में प्रतिनिधि सरकारें हिंदुओं को कोई हानि नहीं पहुंचाएंगी। तो फिर हिंदू महासभा के अध्यक्ष इसका विरोध क्यों करते हैं? संभवतः इसलिए कि इससे मुसलमानों का लाभ होगा, जो वह सहन नहीं कर सकते।
IV
केंद्रीय विधान सभा में 1939 के मुस्लिम विवाह-अधिनियम को समाप्त करने के बारे में हुई बहस से बेहतर उदाहरण इस बारे में कोई और नहीं हो सकता कि हिंदू और मुसलमान अपने-अपने शक्ति संतुलन के अनुरक्षण की चिंता में कितनी दूर तक जा सकते हैं।
1939 से पूर्व कानून यह था कि मुस्लिम कानून के अंतर्गत विवाहित पुरुष अथवा महिला के स्वधर्म-त्याग से विवाह उस स्थिति में भंग हो जाता था, जबकि कोई विवाहित मुस्लिम महिला अपना धर्म बदल लेती थी। ऐसे में वह अपने नए धर्म के अनुयायी किसी भी पुरुष से विवाह करने को स्वतंत्र हो जाती थी। साठ वर्ष तक भारत की सभी अदालतों में इस कानून का दृढ़तापूर्वक पालन किया गया।ऽ
1939 के अधिनियम VIII द्वारा इस कानून को रद्द कर दिया गया था, जिसकी धारा 4 इस प्रकार हैः
फ्किसी विवाहित मुस्लिम महिला द्वारा इस्लाम धर्म के परित्याग से अथवा
उसके इस्लाम धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण से स्वतः ही
उसका विवाह-विच्छेद नहीं होगा।
बशर्ते कि ऐसे धर्म परित्याग अथवा धर्मांतरण के बाद महिला धारा
- अधिक ब्यौरे के लिए जाति-उन्मूलन (एनिहिलिशन ऑफ कास्ट) विषय पर मेरी लघु पुस्तिका देखिए।
- हरिजन, 11 जनवरी, 1936