10. सामाजिक निष्क्रियता - Page 243

234 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

2 में उल्लिखित किसी भी आधार पर अपने विवाह-विच्छेद के लिए

न्यायालय से आदेश प्राप्त करने की हकदार होगी,

बशर्ते यह भी कि इस धारा के उपबंध उस महिला के मामले में

लागू नहीं होंगे, जिसने अपना धर्म त्यागकर इस्लाम धर्म ग्रहण किया था

और बाद में फिर अपने पूर्व धर्म को अपना लिया है।य्

इस अधिनियम के अनुसार, किसी विवाहित मुस्लिम महिला द्वारा कोई अन्य धर्म स्वीकार कर लेने मात्र से ही उसका विवाह भंग नहीं होगा। जो कुछ उसे प्राप्त होता है, वह तलाक लेने का अधिकार ही है। यह देखकर परेशानी ही होती है कि धारा 2 में न तो धर्मांतरण को और न ही स्वधर्म त्याग को तलाक का आधार माना गया है। इस कानून का परिणाम यह है कि विवाहित मुस्लिम महिला को अपने आत्मबोध की आजादी नहीं है और हमेशा के लिए अपने उस पति से बंधी रहती है, जिसकी धार्मिक आस्था उसके लिए पूर्णतः घृणास्पद है।

इस परिवर्तन के समर्थन में जो आधार पेश किए गए उन पर भी ध्यान देना अभीष्ट होगा। इस विधेयक को पेश करने वाले काज़ी काज़मी एम.एल.ए. ने परिवर्तन के पक्ष में एक नितांत विलक्षण तर्क पेश किया। विधेयक को पेश करने के संदर्भ में अपने भाषण में उन्होंने कहाः

फ्स्वधर्मत्याग को किसी भी अन्य धर्म के समान इस्लाम ने एक घोर अपराध

माना है, जो प्रायः राज्य के विरुद्ध अपराध जैसा ही है। यह प्रावधान रखना

इस्लाम धर्म के लिए कोई गौरव की बात नहीं है। यदि हम किसी भी

राष्ट्र के पुराने अधिनियमों को देखें तो पाएंगे कि ऐसे ही प्रावधान अन्य

संहिताओं में भी उपलब्ध हैं। पुरुष के लिए अधिक कठोर दंड, अर्थात्

मृत्युदंड, जबकि महिलाओं के लिए मात्र कारावास की व्यवस्था थी। यह

मुख्य प्रावधान इसलिए था कि क्योंकि यह पाप है, अपराध है, इसके लिए

दंड दिया जाना चाहिए, इसलिए महिला को पत्नी का अधिकार गंवाना

पड़ता था। मात्र यही नहीं, अपितु समाज में अपने सभी स्तरों से उसे वंचित

होना पड़ता था। उसे अपनी संपत्ति और नागरिक अधिकारों से भी वंचित

होना पड़ता था। परंतु हमने यह पाया है कि 1850 में ही एक अधिनियम

पारित किया गया था, जो ‘जातीय अयोग्यता निवारण अधिनियम, 1850

का अधिनियम-21’ के नाम से जाना जाता था....।

ऽ जबरदस्त खान बनाम उसकी पत्नी के मामले में 1870 में उत्तर-पश्चिम प्रांत के हाईकोर्ट द्वारा दिया गया

निर्णय सबसे पहला निर्णय था।