10. सामाजिक निष्क्रियता - Page 244

सामाजिक निष्क्रियता

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फ्........इस अधिनियम द्वारा वह प्रावधान रद्द कर दिया गया जिससे कि महिला द्वारा स्वधर्म त्याग करने पर उसे अपने नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाता था। अब उसे अपने नागरिक अधिकारों या अपनी संपत्ति की जब्तगी, अथवा उत्तराधिकार अथवा इसी तरह के किसी अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। सवाल केवल यह है कि विधान से उसे यह सहायता मिली, फिर उसे विचार की स्वतंत्रता मिली। उसे यह स्वतंत्रता मिली कि वह अपनी पसंद के किसी भी धर्म को ग्रहण कर सकती है और जब्तगी की वह धारा हटा दी गई है, जिससे उसे कष्ट उठाना पड़ता था और धर्म-परिवर्तन करने पर अवरोध उत्पन्न होता था। सवाल यह है कि इसके बाद उस महिला के पत्नित्व के अधिकार पर हम कहां तक अंकुश लगा सकते हैं। समाज में उसकी पत्नी-स्थिति महत्वपूर्ण है। वह किसी परिवार का अंग होती है, उसके बच्चे होते हैं, उसके अन्य रिश्ते व संबंध भी होते हैं। यदि उसका मन-मस्तिष्क उदार व स्वतंत्र है, तो हो सकता है कि वह उसी पुराने धर्म में बने रहना पसंद न करे। यदि वह अपना धर्म बदलती है तो हम अपने आधुनिक विचारों के अनुरूप उस पर और दंड क्यों थोपें कि वह अपने पति की पत्नी नहीं रहेगी। मेरा यह विनम्र मत है कि अब जब हम विचार-स्वातंत्र्य और धर्म-स्वातंत्र्य के पक्षधर बनते हैं और जब हम विभिन्न समुदायों के बीच अंतर्विवाह की वकालत करते हैं तो हमारे लिए ऐसे प्रावधान का समर्थन करना अनुचित होगा कि आस्था या धर्म बदलने मात्र से वह अपने पति की पत्नी होने के अधिकार से भी वंचित हो जाए। अतएव आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हम किसी भी प्रकार से इस विपरीत सुझाव का समर्थन नहीं कर सकते कि धर्मत्याग से उसे अपने पति की पत्नी होने के अधकिर से वंचित होना पड़े। परंतु यह तो तर्क का एक भाग ही रहा।

फ्पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 की धारा 32 के अनुसार, कोई भी विवाहित महिला इस आधार पर तलाक की मांग कर सकती है कि उसका पति पारसी नहीं रहा.....

फ्इससे दो बातें स्पष्ट हैं। पहली यह कि विवाह-विच्छेद का यह आधार किसी धार्मिक विचार अथवा धार्मिक भावना पर आधारित नहीं है, क्योंकि यदि धर्मांतरण के बाद पुरुष अथवा महिला दोनों में से किसी को भी विवाह भंग करने के लिए अभियोग का कोई अधिकार नहीं है। दूसरी बात यह है कि वादी को ही यह शिकायत है कि दूसरे