सामाजिक निष्क्रियता
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से यह कह सकता हूं कि बुखारा मत के अनुसार विवाह भंग नहीं होता,
बल्कि विवाह संबंध निलंबित होता है। विवाह निलंबित हो जाता है, किंतु
पत्नी को तब तक हिरासत अथवा किसी की देखरेख में नजरबंद रखा
जाता है जब तक कि वह पश्चाताप नहीं कर लेती और पुनः इस्लाम धर्म
स्वीकार नहीं कर लेती, और फिर उसे पति से निकाह के लिए प्रोत्साहित
किया जाता है, जिसका निकाह केवल निलंबित हुआ था, समाप्त अथवा
रद्द नहीं। दूसरे मत के अनुसार, धर्मांतरण कर लेने पर मुस्लिम महिला
अपने पति की पत्नी नहीं रहती, बल्कि उसकी बंधक स्त्री हो जाती है।
एक धारणा जो इसी दृष्टिकोण की परिणति है, यह है कि यह आवश्यक
नहीं कि वह अपने पूर्व पति की बंधक स्त्री रहे, अपितु वह समग्र मुस्लिम
समुदाय की बंधक स्त्री हो जाती है और कोई भी व्यक्ति उसे एक बंधक
स्त्री के तौर पर नौकर रख सकता है। तीसरा मत समरकंद और बलख के
उलेमा का है, जिसके अनुसार ऐसे धर्मांतरण से वैवाहिक बंधन प्रभावित
नहीं होता और महिला अपने पति की पत्नी बनी रहती है। ये तीन मत हैं।
प्रथम मत के एक अंश बुखारा मत को अदालतों ने मान्यता दी और एक
के बाद एक निर्णय इसी अंश पर आधारित रहे।
फ्इस सभा को यह भली भांति विदित है कि यह एकमात्र दृष्टांत
नहीं है, जहां विधान के द्वारा, न्यायिक भूल का परिमार्जन करने की चेष्टा
की गई है। बल्कि दूसरे अनेक मामले भी हैं_ जहां न्यायिक भूलें हुई
हैं अथवा जहां न्यायिक अभिमत विवादास्पद रहा है अथवा विधि में ही
अस्पष्टता या अनिश्चितता रही है। न्यायिक अभिमतों में सन्निहित भूलों
का विधान द्वारा परिमार्जन निरंतर किया जाता रहा है। परन्तु इस विशिष्ट
मामले में तो भूल दर भूल ही नहीं हुई, भूलों की त्रासदी हुई है। निश्चय
ही, यह अनुभव किया जाना चाहिए कि विधेयक के लिए मेरे प्रस्ताव
का कदापि यह उत्तर नहीं हो सकता है कि चूंकि उच्च न्यायालयों ने मेरे
विपरीत निर्णय दिए हैं, इसलिए इस सभा में उपस्थित होकर इनके संदर्भ
में विधेयक बनाने का मेरा आग्रह अनधिकार चेष्टा होगी।य्
संशोधन की गूढ़ता को ध्यान में रखते हुए, उसके पक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्क बहुत ही तथ्यहीन थे। श्री काज़मी यह नहीं समझ सके कि यदि पारसी ईसाई और मुस्लिमों के तलाक से संबंधित विधियों में भिन्नताएं हैं, तब उस स्थिति में धर्मांतरण
ऽ लेजिस्लेटिव असेंबली डिबेट्स, 1938, खंड-ट, पृ. 1098-1101