238 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
के प्रामाणिक साबित हो जाने पर, चूंकि मुस्लिम कानून पहले का है, औचित्यपूर्ण बात तो यह होती कि मुस्लिम कानून को पीछे धकेलने की बजाए पारसी और ईसाइयों के कानून को ही उत्तरोत्तर प्रगतिशील बनाया जाता। श्री नैरंग को यह पूछना चाहिए था कि मुस्लिम विधिवेत्ताओं की विविध विचारधाराओं के परिप्रेक्ष्य में क्या यह अधिक न्यायसंगत नहीं होगा कि उस अधिक प्रबुद्ध दृष्टिकोण को ही स्वीकार किया जाए, जो मुस्लिम महिलाओं की स्वतंत्रता को मान्यता प्रदान करता है तथा उस असभ्य दृष्टिकोण को अस्वीकार किया जाए जो उन्हें गुलाम बनाता है।
जो भी हो, कानूनी तर्कों का परिवर्तन के वास्तविक उद्देश्यों से कुछ लेना देना नहीं था। वास्तविक उद्देश्य तो किसी महिला का दूसरे धर्म में अवैध धर्मांतरण पर रोक लगाना था ताकि जल्दबाजी में किसी दूसरे धर्म के धर्मावलम्बी उसे नए समुदाय में सम्मिलित कर उसका विवाह न कर दें और वह अपने मूल समुदाय में वापस न हो सके। मुस्लिम महिलाओं के हिन्दू धर्म में धर्मांतरण और हिन्दू महिलाओं के मुस्लिम धर्म में धर्मांतरण का सामाजिक तथा राजनैतिक परिणाम बड़ा भयावह हुआ करता है। इसका कुछ प्रभाव दोनों समुदायों के संख्यात्मक संतुलन पर पड़ता है। महिलाओं का अपहरण कर यह असंतुलन उत्पन्न किया जाता रहा है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं राष्ट्रीयता की स्वाभाविक अंकुरण और संरक्षण स्थली होती हैं।ऽ महिलाओं का धर्मांतरण और तदनुसार उसका विवाह करा देना, मुस्लिमों के द्वारा हिन्दुओं, और हिन्दुओं के द्वारा मुस्ल्मिं के प्रति सही में विध्वंसकारी कृत्य माना गया है, जिसका उद्देश्य उनके संख्यात्मक अनुपात में परितर्वन करना रहा है। महिलाओं के अपहरण की यह घृणित प्रथा पशुओं की चोरी की घटनाओं की तरह ही सामान्य हो गई थी और उसका स्पष्ट प्रभाव सामुदायिक संतुलन पर पड़ रहा था। अतः इसको रोकने के लिए प्रयास किया जाना अपेक्षित था। इस विधेयक के पीछे वास्तविक कारण यही था, जो इस विधेयक की धारा 4 के दो प्रावधानों को देखने से स्पष्ट हो जाता है। परंतुक (1) में हिंदू, मुसलमानों को यह सुविधा प्रदान करते हैं कि मुस्ल्मि महिला का हिन्दू धर्म में धर्मांतरण के बावजूद इसके मुस्लिम पति से उसका सम्बन्ध विच्छेद नहीं होगा। परंतुक (2) के अनुसार मुस्लिम हिन्दुओं को यह सुविधा प्रदान करते हैं कि यदि वे विवाहित हिन्दू महिला का धर्मांतरण करें तथा उस महिला का एक मुसलमान से विवाह कर दिया जाए तो, अगर मुस्ल्मि धर्म को वह महिला त्याग देती है, उस स्थिति में उसका मुस्लिम पति से सम्पन्न हुआ विवाह भी विघटित समझा जाएगा, तथा वह हिन्दू समुदाय में पुनः प्रवेश कर सकेगी। इस प्रकार कानूनी परिवर्तन के पीछे संपूर्ण मंशा संख्यात्मक अनुपात को संतुलित रखने की ही है, और मात्र इसी उद्देश्य के लिए महिलाओं के अधिकार की बलि चढ़ा दी गई।