सामाजिक निष्क्रियता
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इस बुराई के दो और पहलू हैं, जिनकी ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।
एक पहलू यह है कि एक के द्वारा किए जा रहे सामाजिक सुधारों को दूसरे के द्वारा तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता है। ऐसा सामाजिक सुधार यदि दूसरे समुदाय की प्रतिरोध क्षमता में वृद्धि करता है तब यह तत्काल सामुदायिक विद्वेष का कारण बन जाता है।
स्वामी श्रद्धानन्द एक बड़ी विचित्र घटना का उल्लेख करते हैं। यह घटना उपर्युक्त मानसिकता का सटीक चित्रण करती है। 26 अप्रैल, 1926 के ‘लिबरेटर’ में अपने संस्मरण में उन्होंने इस घटना के सम्बन्ध में यह लिखा हैः-
फ्श्री रानाडे इस सामाजिक सभा को, जिसे ‘नेशनल’ कहा गया, मार्गदर्शन
प्रदान करने के लिए वहां मौजूद थे। यह सभा अपने प्रारम्भ से ही सभी
क्षेत्रों में हिन्दुओं की एक सभा थी। इस राष्ट्रीय सामाजिक सभा में बरेली
के मुफती साहेब एकमात्र मुस्लिम प्रतिनिधि थे। सभा का आरम्भ एक हिन्दू
प्रतिनिधि तथा मेरे उस प्रस्ताव से हुआ जिसका सम्बन्ध बाल-विधवाओं के
पुनर्विवाह से था। सनातनी पण्डितों ने मेरे इस प्रस्ताव का विरोध किया।
तब मुफती ने सम्बोधित करने हेतु आज्ञा मांगी। इस पर स्व. बैजनाथ ने यह
कहा कि प्रस्ताव का सम्बन्ध चूंकि केवल हिन्दुओं से है, उनके बोलने की
आवश्यकता नहीं है। इस पर मुफती आग-बबूला हो गए।
फ्सभापति के लिए बचाव का कोई रास्ता नहीं था, अतः मुफती
साहेब को अपनी बात रखने का अवसर दे दिया गया। मुफती साहेब का
तर्क था कि चूंकि हिन्दू शास्त्र पुनर्विवाह की अनुमति प्रदान नहीं करते
हैं, इसलिए इस पर बल दिया जाना धर्मसम्मत बात नहीं है। दोबारा, जब
धर्मांतरित ईसाइयों और मुसलमानों का हिन्दू धर्म में पुनः धर्मांतरण के विषय
पर संकल्प आया तब मुफती साहेब ने तर्क प्रस्तुत कर दिया कि जब किसी
व्यक्ति ने हिन्दू धर्म का परित्याग कर दिया है तब उसकी पुनर्वापसी को
अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।य्
एक दूसरा उदाहरण अछूतों की समस्याओं की प्रति मुसलमानों के दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है। मुसलमान हमेशा से ही दलित समुदायों को तृष्णा से देखते आए हैं तथा यह हिन्दू और मुसलमानों से बीच ईर्ष्या का कारण बना रहता है क्योंकि हिंदुओं को यह आशंका होती है कि दलित समुदायों को अपने में समाहित कर मुसलमान
ऽ राष्ट्रवाद के बनाए रखने में महिलाओं की भूमिका पर समुचित रूप से ध्यान नहीं दिया गया है। इस
विषय पर ‘ऐसे ऑन नेशनैलिटी’ में रेनन के विचार देखिए।