240 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
कहीं अधिक शक्तिशाली न बन जाएं। 1909 में मुसलमानों ने एक दृढ़ कदम उठाया। उन्होंने दलित समुदायों को मतदाता सूचियों में बतौर हिन्दू नामांकित किए जाने पर आपत्ति उठाई। वर्ष 1923 में श्री मोहम्मद अली ने कांग्रेस के अध्यक्ष की हैसियत से अपने भाषण में 1909 ई. में मुसलमानों के प्रस्थापित दृष्टिकोण से अधिक आगे बढ़कर नई प्रतिस्थापनाएं कीं। उन्होंने कहाः
फ्अलामस और पीपल के दरख्तों और बाजे-गाजे वाले जुलूसों के सम्बन्ध में
बचकाना विवाद हुआ करते हैं, किंतु एक प्रश्न जरूर है कि यदि साम्प्रदायिक
गतिविधियों को मैत्रीपूर्ण ढंग से सुलझा नहीं लिया जाता है तो उससे सहज
ही गैर-दोस्ताना व्यवहार की जमीन तैयार हो जाती है। यदि हिन्दू दलितों
को तेजी से समाहित नहीं कर लेते तब यह उन समुदायों के धर्मांतरण का
प्रश्न बन जाएगा। ईसाई उनका धर्मांतरण कर रहे हैं, और इस सम्बन्ध में
प्रश्न कोई नहीं उठाता है। किन्तु किसी मुस्लिम सामाजिक संगठन को इस
कार्य के लिए जैसे ही गठित किया जाएगा, हिन्दू समाचारपत्रों में हो-हल्ला
शुरू हो सकता है। एक अत्यन्त ही धनाढ्य तथा प्रभावशाली सज्जन ने,
जो दलितों के धर्मांतरण के लिए व्यापक पैमाने पर धर्मांतरण करने वाली
संस्था का गठन कर सकते हैं, मुझे बताया है कि अग्रणी हिन्दुओं के साथ
सहमति हो सकती है कि देश को अलग-अलग क्षेत्रों में बांट दिया जाए
जिनमें धर्मांतरण का कार्य मुसलमान और हिन्दू अलग-अलग कर सकें।
प्रत्येक सम्प्रदाय वर्षवार, अथवा इससे अधिक अवधि के भीतर, कितने
लोगों का धर्मांतरण कर सकता है या अपने भीतर समाहित कर सकता है,
इसकी तफसील तैयार करे। इन तफसीलों का यह आधार होगा कि प्रत्येक
संप्रदाय कितने कार्यकर्त्ता और कितना धन लगा सकता है और पूर्व वर्ष
के इनके वास्तविक आंकड़ों के आधार पर इनकी जांच की जा सकती
है। इस विधि से दोनों ही सम्प्रदाय अपने में समाहित करने या धर्मांतरण
करने का कार्य करने के लिए स्वतंत्र रहेंगे, या अन्य सुधारवादी कार्य भी
वे कर सकेंगे, और उनके बीच टकराव की कोई संभावना नहीं रहेगी।
मैं इस सुझाव को फिलहाल ईमानदारी और स्पष्टता के साथ रख सकता
हूं, परन्तु मेरे हिन्दू भाई इस सुझाव के प्रति कैसा रुख अपनाएंगे, यह मैं
नहीं कह सकता। मैं अपनी ओर से जो कुछ भी कर रहा हूं वह यह कि
बड़ौदा स्टेट में तथा मध्य प्रान्त के गोंड लोगों के बीच काली पूजा का
हमने जो रूप देखा है, वह हम सभी के लिए अपमानजनक है। यदि हिन्दू
लोग दलित समुदायों को अपने में समाहित नहीं कर लेते हैं, तब दूसरे उन्हें