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सामाजिक निष्क्रियता

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अपने धर्म में धर्मांतरित कर लेंगे और यही किया भी जाना चाहिए और

इसी परिस्थिति में कट्टठ्ठरवादी हिन्दू भी उन्हें अछूत मानना छोड़ेंगे। धर्मांतरण

एक शक्तिशाली रासायनिक प्रक्रिया की तरह उनका कायाकल्प करता हुआ

प्रतीत होता है। पर क्या यह धर्मांतरण का प्रोत्साहन नहीं है?य्

इसका अन्य पहलू वे तैयारियां हैं, जो हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे के विरुद्ध जोर-शोर से कर रहे हैं। यह दो राष्ट्रों के बीच सामाजिक युद्धास्त्रों की होड़ की तरह है। यदि हिंदुओं के पास काशी हिन्दू विश्वविद्यालय है, तो मुसलमानों के पास भी एक अलीगढ़ विश्वविद्यालय होना ही चाहिए। हिन्दू यदि शुद्धि आन्दोलन आरम्भ करते हैं, मुसलमान निश्चय ही ‘तबलीग’ आन्दोलन छेड़ेंगे। हिन्दू यदि संगठन बनाते हैं तो इसके जवाब में मुस्लिम ‘तनजीम’ स्थापित करते हैं। अगर हिन्दुओं का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है, तब मुसलमानों का भी मुस्ल्मि खाकसार है। सामाजिक युद्धास्त्रों तथा सज्जाओं की होड़ को जिस दृढ़ता और जिन आशंकाओं से संचालित किया जा रहा है, वह राष्ट्रों के बीच संघर्ष का लक्षण है। प्रतीत होता है कि दोनों ही राष्ट्र एक दूसरे की तैयारियों की समीक्षा करते रहते हैं और युद्ध जैसी तैयारियां कर रहे हैं। मुसलमान समझते हैं कि हिन्दू उन्हें अधीनस्थ बना रहे हैं और हिन्दू अनुभव करते हैं कि मुसलमान उन पर पुनर्विजय करना चाह रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों ही युद्ध की तैयारी में संलग्न हैं और एक दूसरे की तैयारियों पर नजर रखते हैं।

इस प्रकार की स्थिति अनिष्टकारी होगी। यह एक दुश्चक्र है। मुसलमान हिन्दुओं के सशक्त होने पर अपने लिए खतरा महसूस करतें हैं। खतरे से निपटने के लिए वे अपनी शक्ति में वृद्धि करने का प्रयास करते हैं। फिर उनकी स्थिति से संतुलन प्राप्त करने के लिए यही सब हिन्दू करते हैं। जैसे-जैसे ये तैयारियां बढ़ती हैं, उनमें संदिग्धता, षड्यंत्र और गोपनीयता भी बढ़ती जाती है। शांतिपूर्वक सुलझाव की संभावनाएं शुरू में ही नष्ट हो जाती हैं, और चूंकि प्रत्येक व्यक्ति इससे भयाक्रांत रहता है तथा इसके लिए तैयारी भी करता रहता है, दोनों सम्प्रदायों के बीच युद्ध अवश्यम्भावी प्रतीत होता है। इस तरह जिन परिस्थितियों में हिन्दू और मुसलमान अपने को पाते हैं, सिवाए इसके कि एक दूसरे की चुनौती से निबटने की तैयारियां वे करतें रहें, और कर ही क्या सकते हैं? यह संघर्ष अस्तित्व बनाए रखने के लिए है, और मुख्य मुद्दा भी यही है, कि अस्तित्व का स्तर तथा गुणवत्ता।

निश्चय ही इस चर्चा से दो तथ्य उभरते हैं। एक तो यह है कि, हिन्दू और मुसलमान एक दूसरे को खतरे की दृष्टि से देखते हैं और दूसरा यह कि खतरों का सामना करने के क्रम में, सामाजिक कुरीतियों को, जिनसे कि वे पीडि़त हैं, दूर