एक राष्ट्र का अपने घर के लिए आह्वान
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अतीत, महापुरुष गौरव - मेरा तात्पर्य सही ढंग के गौरव से है - ये ही
उस सामाजिक पूंजी का सृजन करते हैं जिस पर राष्ट्रीयता का विचार
सृजित हो सकता है। अतीत का समान गौरव, वर्तमान में समान आकांक्षा,
साथ-साथ मिलकर किए गए महान कार्य, वैसे ही कार्यों को पुनः करने
की इच्छा - ये सभी किसी व्यक्ति को राष्ट्र भाव से प्रेरित करने वाली
अनिवार्य स्थितियां हैं। हम जितने अधिक कष्ट सहन कर त्याग करते हैं,
उसी अनुपात में उनके प्रति हमारी आसक्ति होती है। हम जो मकान बनाते
हैं, और जिसे हमें अपने वंशधरों को सौंपना है, उससे हम प्यार करते हैं।
स्पार्टन श्लोक ‘हम वहीं हैं जो आप थे, हम वही बनेंगे जो आप हैं’, यही
सरल शब्दों में हर देश का राष्ट्रगान है।
फ्अतीत की कीर्ति और संतापों में हम सहभागी हैं, भविष्य में भी
इच्छित आदर्श की प्राप्ति की जानी है, हमने साथ-साथ पीड़ा भोगी है,
साथ ही आह्लादित हुए हैं और हमारी आशाएं भी समान हैं। ये सभी
बातें कई अन्य समान तत्वों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण हैं और अनुकूल
विचारों के अनुरूप ही इनका परिवेश है। जाति और भाषा की विभिन्नताओं
के बावजूद इन सबका महत्व समझा जा सकता है। मैंने अभी-अभी कहा
है कि साथ-साथ पीड़ा भोगी है, वास्तव में ही साथ-साथ पीड़ा भोगना
आह्लाद की तुलना में एकता का अधिक मजबूत बंधन है। जहां तक
राष्ट्रीय स्मृतियों का संबंध है, विजयों की अपेक्षा शोक के अवसरों का
महत्व अधिक है, क्योंकि वे हम पर दायित्व डालते हैं, वे सांझा प्रयासों
की मांग करते हैं।य्
क्या ऐसे कोई सामूहिक ऐतिहासिक पूर्व-दृष्टांत हैं, जिनके बारे में यह कहा जा सके कि हिन्दू और मुस्लिम गर्व अथवा दुःख के विषयों में सहभागी बनते हैं? यही इस प्रश्न का सार है। यदि हिंदू यह चाहते हैं कि हिंदू और मुसलमान मिलकर एक राष्ट्र का गठन करें तो इस प्रश्न का उत्तर हिंदुओं को देना ही होगा। जहां तक उनके संबंधों का मामला है, तो वे एक दूसरे के खिलाफ संघर्षरत सशस्त्र बटालियनों जैसे रहे हैं। सामूहिक उपलब्धि के लिए योगदान का कोई भी सामूहिक चक्र नहीं चला। उनका अतीत तो पारस्परिक विनाश का अतीत है - पारस्परिक शत्रुता का अतीत, राजनीतिक और धार्मिक दोनों ही क्षेत्रों में जैसा कि भाई परमानंद ने हिंदू राष्ट्रीय आंदोलन’ शीर्षक वाले अपने पत्रक में इंगित किया है - फ्इतिहास में हिंदू लोग पृथ्वीराज, प्रताप, शिवाजी और वीर वैरागी का आदर सहित स्मरण करते हैं, जो इस भूमि के सम्मान और स्वतंत्रता के लिए मुसलमानों के विरुद्ध लड़े थे, जबकि मुसलमान