242 सामाजिक निष्क्रियता बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
करने के उद्देश्य को ही उन्होंने टाल दिया है। क्या यह वांछनीय स्थिति है? यदि यह वांछनीय नहीं है, तब इसे कैसे खत्म किया जाए?
यह कोई नहीं कह सकता कि सामाजिक सुधारों से सम्बन्धित समस्याओं को दरकिनार कर देना औचित्यपूर्ण बात होगी। स्वस्थ राजनीतिक संरचना की यह अपेक्षा होती है कि सामाजिक कुरीतियों का, उत्पीड़न और अन्याय का प्रतीक बन जाने के पहले ही, उन्मूलन कर दिया जाए क्योंकि कहीं भी आर्थिक और सामाजिक कुरीतियां ही पतन अथवा क्रांति की जनक होती हैं। यह विवाद का विषय हो सकता है कि पहले राजनीतिक पुनःनिर्माण हो या पहले सामाजिक पुनर्निर्माण हो। किन्तु इस तथ्य पर मतांतर नहीं हो सकता कि राजनीतिक सत्ता का उपयोग, आर्थिक और सामाजिक पुनर्निर्माण के निमित्त किया जाना चाहिए। राजनीतिक सत्ता के लिए किया जा रहा पूरा संघर्ष बेमानी और व्यर्थ ही होगा यदि इस संघर्ष के संबंध में यह अनुभूति न हो कि राजनीतिक सत्ता के अभाव में ही सामाजिक कुरीतियों के कारण हमारे समाज में घुन लग गया है और वह नष्ट होता जा रहा है। किन्तु मान लीजिए कि हिन्दू और मुसलमान किसी प्रकार राजनीतिक सत्ता के स्वामी बन जाते हैं तो इससे यह आशा कैसे की जा सकती है कि वे इस सत्ता का उपयोग सामाजिक पुनःनिर्माण के लिए करेंगे ही? इस सम्बन्ध में कोई आशा नहीं की जा सकती। जब तक मुसलमान और हिन्दू एक दूसरे के लिए खतरा ही बनते रहेंगे, उनका पूरा ध्यान खतरों का सामना करने में ही बंटा रहेगा। मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं का और हिंदुओं के खिलाफ मुसलमानों का संगठित होते रहना जब तक कायम है, तब तक निश्चित रूप से सामाजिक पुनःनिर्माण की बात दबी रहेगी। न तो हिन्दू और न ही मुसलमान आर्थिक और सामाजिक कुरीतियों के बहते हुए नासूर की ओर अपना ध्यान फेरेंगे जिसकी कि तत्काल आवश्यकता है क्योंकि उनकी समझ में सामाजिक पुनःनिर्माण का कदम, निश्चित रूप से मतभेद और विभाजन पैदा कर देगा जबकि एक दूसरे के सम्प्रदाय के खतरों का सामना करने के लिए उन्हें अपनी एकता को ही मजबूत करना चाहिए। यह निर्विवाद है कि जब तक एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय को खतरा मानता रहेगा, तब तक कोई सामाजिक प्रगति नहीं की जा सकेगी और दोनों के ही विचारों और कार्यकलापों पर रूढि़वादिता का बोलबाला रहेगा।य्
कब ये खतरे समाप्त होंगे? जब तक हिन्दू और मुसलमान एक ही संविधान के अंतर्गत एक ही देश में रहते रहेंगे, यह खतरा कायम रहेगा क्योंकि दोनों सम्प्रदायों पर एक संविधान लागू होने में यह आशंका है कि अपने आरम्भ के काल में स्थापित संतुलन के समाप्त होने पर - जो अवश्यंभावी है - मुसलमान और हिन्दू एक दूसरे को