साम्प्रदायिक आक्रामकता 257
हिन्दुओं और सिक्खों के द्वारा विरोध होने तथा साईमन कमीशन के द्वारा खारिज कर दिए जाने के बावजूद, पंच निर्णायक की हैसियत से ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों की सभी नई और पुरानी मांगों पर स्वीकृति की मुहर लगा दी।
25 जनवरी, 1932 के गजट में, एक अधिसूचना ख्1, द्वारा भारत सरकार ने 1916 के फ्भारत सरकार अधिनियमय् की धारा 52- A की उप-धारा - 2 में प्रदत्त अधिकार के पालन में अधिसूचित किया कि उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत अब गवर्नर ख्2, द्वारा शासित प्रान्त होगा। भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 289 की उप-धारा (1) के प्रावधान के अंतर्गत जारी किये गए आदेश के द्वारा राज्य परिषद ने एक अपै्रल, 1936 से बम्बई से अलग कर सिंध को भी गवर्नर प्रशासित अलग प्रान्त बना दिया, जिसका नामकरण सिंध का प्रान्त किया गया। भारत सचिव द्वारा जारी किए गए संकल्प में, जिसका 7 जुलाई, 1934 को प्रकाशन किया गया है, सभी प्रांतीय तथा केन्द्रीय (इम्पीरियल) सेवाओं में मुसलमानों की भागीदारी पच्चीस प्रतिशत निश्चित कर दी गई। यह सत्य है कि मुसलमानों की यह मांग कि अवशिष्ट शत्तिQयां, प्रान्तीय सरकारों में निहित कर दी जायें, स्वीकार नहीं की गई। किन्तु दूसरे अर्थों में यह माना जा सकता है कि, इस सम्बन्ध में भी मुसलमानों की मांगें स्वीकार कर ली गयी हैं। मुसलमानों की मांगों का सार यह था कि अवशिष्ट शत्तिQयां केन्द्रीय सरकार के पास नहीं होनी चाहिए, जिससे दूसरा अर्थ यही था कि इन्हें हिन्दुओं के हाथों में नहीं होना चाहिए। 1935 ई. के भारत सरकार अधिनियम की धारा 104 के द्वारा बिल्कुल यही सुनिश्चित किया गया है, जिसके अनुसार अवशिष्ट शत्तिQयां गवर्नर जनरल को अपने विवेकानुसार प्रयोग करने के लिए सौंप दी गयी हैं। पंजाब तथा बंगाल में सांविधिक बहुमत के संबंध में बची-खुची मांगों को, फ्कम्यूनल एवार्डय् के अन्तर्गत लागू कर दिया गया। यह सत्य है कि दूसरे हितों को भी प्रतिनिधित्व दिए जाने की आवश्यकता की पृष्ठभूमि में, संपूर्ण सदन में मुसलमानों को सांविधिक बहुमत प्रदान नहीं किया जा सका। किन्तु बंगाल और पंजाब में मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध सांविधिक बहुमत दे दिया गया है परन्तु लखनऊ समझौते में अल्पसंख्यक मुसलमानों को मिलने वाली महत्ता को बिना नुकसान पहुंचाए।
- अधिसूचना सं. एफ 173/31-आर/भारत का असाधारण, राजपत्रं, दिनांक 25 जनवरी, 1932
- साइमन आयोग ने यह कहते हुए दावा ठुकरा दिया फ्हम बे्र समिति के इस दृष्टिकोण से पूरी तरह से
सहमत हैं कि उत्तर पश्चिमी सीमान्त प्रान्त के संवैधानिक विकास के लिए अब प्रावधान किए जाने चाहिए.
.........किंतु हम यह भी मानते हैं कि इस प्रान्त की स्थिति और भारतीय प्रतिरक्षा की समस्याओं से दूसरे
अभिन्न संबंध इस तरह के हैं कि विशेष व्यवस्था किए जाने की जरूरत है। इसलिए भारत के अन्य भागों
में प्रान्तीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त प्रस्तावों को स्वतः ही यहाँ लागू किया जाना संभव नहीं है।य् उन्होंने यह
कहते हुए इसका औचित्य बतायाः फ्उस मनुष्य के सिगरेट पीने के सहज अधिकार पर पाबंदी अवश्य
लगाई जानी चाहिए जो बारूद के ढेर पर खड़ा है।य् -प्रतिवेदन, खंड दो, पैरा 120-121