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साम्प्रदायिक आक्रामकता 259

फ्यह धारा विदेश सचिव पर भी यह दायित्व सौंपती है कि गवर्नर जनरल अथवा गवर्नर से प्राप्त प्रस्तावित संशोधनों के सम्बन्ध में अपनी राय वह संसद के पटल पर यह स्पष्ट करते हुए रखे कि संशोधनों का किसी भी अल्पसंख्यक के हितों पर क्या प्रभाव पड़ेगा तथा संसद को इससे भी अवगत कराएँ कि इस सम्बन्ध में वह क्या कार्रवाई करना चाहते हैं।

फ्इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप किसी भी संवैधानिक संशोधन को ‘आर्डर इन काउंसिल’ द्वारा क्रियान्वित किया जाएगा, परन्तु यह इस शर्त के साथ कि आदेश का प्रारूप संसद के दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत संकल्प से अनुमोदित किया गया है। इस शर्त को विधेयक की धारा 309 में पूरा किया गया है।

फ्दस वर्ष की अवधि की समाप्ति से पूर्व इस प्रकार की संवैधानिक पहल भारत की विधायिका सभाएं और सरकारें नहीं कर सकतीं। तथापित दस वर्ष की अवधि की समाप्ति से पूर्व आर्डर इन काउंसिल द्वारा ऐसे संशोधन करने की शत्तिQ, (संसद के दोनों सदनों के अनुमोदन के बाद) इस धारा में निविष्ट है_ परन्तु प्रथम दस वर्ष के दौरान (और यदि भारत की विधायिका सभाओं ने पहल नहीं की तो उसके बाद) भारत के सचिव पर यह कर्त्तव्य रूप में लाजमी होगा कि संशोधनों (यदि वे मामूली प्रकार के न हों), को आर्डर इन काउंसिल द्वारा अनुमोदित रूप में दोनों सदनों के समक्ष रखे जाने से पहले, वह प्रभावित होने वाली भारत की सरकारों या विधायिका सभाओं से परामर्श कर लेंगे।य्

पूर्ववर्ती अनुच्छेद में जिन शत्तिQयों का प्रसंग है, उनकी आवश्यकता के कारण इस प्रकार हैं-

(क) विधायिका सभाओं के गठन तथा मताधिकार के सम्बन्ध में मामूली संशोधनों की आवश्यकता उत्पन्न हो सकती है, जिनका पूर्वानुमान नहीं किया जा सकता, अतः इस स्वरूप के संशोधन किए जाने के लिए, संसद द्वारा संशोधन पारित करने के अतिरित्तQ अन्य विकल्प उपलब्ध रहना लाभदायक नहीं होगा, और न यह व्यावहारिक होगा कि इस प्रकार के संशोधनों का, साम्प्रदायिक पंचाट की शर्तों जैसे महत्वपूर्ण विषय से कानूनन बिलगाव कर दिया जाए_