260 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
(ख) भारत के विभिन्न सम्प्रदायों के बीच कोई एकमत समझौता सम्पन्न
होने की स्थिति में, साम्प्रदायिक पंचाट की शर्तों पर आधारित व्यवस्था में
हेर-फेर करना वांछनीय हो सकता है, और इस प्रकार के किसी सहमति
प्राप्त संशोधन को कार्यान्वित करने हेतु, संसद के द्वारा संशोधन पारित करने
के अतिरित्तQ, अन्य विकल्प उपलब्ध नहीं रहना, ठीक नहीं होगा।
फ्साम्प्रदायिक पंचाट के दायरे के भीतर, महामहिम की सरकार, इस धारा के
अधीन प्रदत्त किसी भी शत्तिQ का प्रयोग करते हुए, संसद के समक्ष संशोधन के
प्रस्ताव की सिफारिश नहीं करेगी, जब तक कि ऐसे संशोधन के लिए संबंधित
सम्प्रदायों में सहमति नहीं हो जाती।
फ्अंत में महामहिम की सरकार फिर से इस तथ्य पर बल देती है कि धारा 304
के अंतर्गत प्राप्त किसी भी शत्तिQ को, धारा 305 की व्यवस्थाओं को देखते हुए,
वह प्रयोग में नहीं लाएगी, जब तक संसद के दोनों सदन निश्चयात्मक संकल्प
द्वारा इस हेतु सहमत नहीं हो जाते हैं।य्
मुसलमानों ने गोलमेज सम्मेलन में क्या मांगें रखीं और उनमें से कौन सी स्वीकृत की गयीं, इसे ध्यान में रखने के बाद, कोई भी यह सोच सकता था कि मुस्लिम मांगें हद छू चुकी हैं तथा 1932 का समझौता अंतिम रूप से किया जा चुका है। परन्तु यह प्रतीत होता है कि इतने से भी मुसलमान संतुष्ट नहीं हुए और प्रतीत होता है कि मुसलमानों के हितों को संरक्षित करने के लिए नयी मांगों की अतिरित्तQ सूची भी तैयार है। 1938 में श्री जिन्ना और कांगे्रस के बीच जो मतांतर हुआ, उसमें श्री जिन्ना से अपनी मांगों को बताने का आग्रह किया गया, परन्तु वे इन्कार कर गए। किंतु श्री जिन्ना तथा पण्डित नेहरू के मध्य इस मतभेद के संदर्भ में जो पत्राचार हुए, उनमें ये मांगें सामने आ गयीं तथा पण्डित नेहरू ने श्री जिन्ना को लिखे गए अपने एक पत्र में उनका तालिकाकरण किया है। उनके तालिकाकरण के अनुसार, निम्नलिखित विवादास्पद विषयों में समझौता होना बाकी हैः-
1929 में मुस्लिम लीग के द्वारा सूत्रीकृत चौदह मद।
साम्प्रदायिक पंचाट के प्रति सभी विरोध को कांगे्रस को वापस ले लेना चाहिए
तथा इसे राष्ट्रीयता नकारने वाला नहीं ठहाराया जाना चाहिए।
- राजकीय सेवाओं में मुसलमानों की निश्चित हिस्सेदारी, कानून पारित करके
संविधान में ही सुनिश्चित कर दी जानी चाहिए।
- संविधान द्वारा मुस्लिम संस्कृति और मुस्लिम वैयक्तिक कानून को संरक्षण दिया
जाना चाहिए।