साम्प्रदायिक आक्रामकता 261
- शहीदगंज मस्जिद से सम्बन्धित आन्दोलन को कांगे्रस अपने हाथ में लेकर और
अपना नैतिक दबाव डाल कर इस मस्जिद को मुसलमानों को दिलाए। 6. फ्अजानय् पढ़ने और धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करने के मुसलमानों के अधिकार
पर किसी भी प्रकार की पाबन्दी नहीं लगायी जाएगी।
मुसलमानों को गोवध करने की आजादी रहनी चाहिए।
जिन प्रान्तों में अभी मुसलमान बहुसंख्यक हैं, वहाँ सीमा के पुनर्निर्धारण या
समायोजन के द्वारा, उनकी बहुसंख्या प्रभावित नहीं की जाएगी। 9. बन्दे मातरम् का गीत त्याग दिया जाये।
- मुसलमान उर्दू को भारत की राष्ट्रीय भाषा बनाना चाहते हैं। उर्दू के प्रयोग को
सीमित नहीं किया जाएगा, या उस पर आघात नहीं किया जाएगा। इस हेतु
संविधान में व्यवस्था की जाए।
- स्थानीय निकायों में, ‘साम्प्रदायिक पंचाट’ जिसका अभिप्राय अलग निर्वाचक-मंडल
तथा जनसंख्या बल से है, के अनुसार मुस्लिम प्रतिनिधित्व का निर्धारण किया
जाएगा।
- तिरंगे झण्डे को या तो बदल दिया जाए या मुस्लिम लीग के झण्डे को बराबर
का महत्व दिया जाए।
- भारतीय मुसलमानों की एकमात्र आधिकारिक तथा प्रतिनिधि संस्था के रूप में
मुस्लिम लीग को मान्यता दी जाए।
- संयुत्तQ मंत्रिमण्डलों का गठन किया जाए।
इस नयी सूची से यह पता नहीं चलता कि मुसलमान अपनी मांगों की इतिश्री कहाँ करने जा रहे हैं। वर्ष 1938 तथा 1939 के एक वर्ष की अवधि में ही एक और महत्वपूर्ण मांग रखी गयी कि हर जगह 50 प्रतिशत भागीदारिता उन्हें उपलब्ध करायी जाए। नयी मांगों की इस सूची में कुछ मांगें चाहे गैर-जिम्मेदाराना न भी हों तब भी सरसरी तौर पर ही फालतू और असम्भव हैं। मिसाल के तौर पर, उर्दू को भारत की राष्ट्रभाषा बनाये जाने और पचास प्रतिशत भागीदारी की मांग को लिया जा सकता है। वर्ष 1929 में मुसलमानों ने इस पर बल दिया कि सदस्यता की संख्या आवंटित करने में बहुसंख्यक को अल्पसंख्यक में तब्दील नहीं किया जाएगा।ऽ इस सिद्धांत को उन्होंने ही विकसित किया था। 1929 में मुसलमानों ने स्व्ीकार किया था कि दूसरे अल्पसंख्यकों को भी संरक्षण की जरूरत है, और यह जिस विधि से मुसलमानों को
ऽ श्री जिन्ना की 14 मदों के लिए देखिए मद संख्या 3