11. सांप्रदायिक आक्रामकता - Page 271

262 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

प्रदान किया गया, उसी विधि से उन्हें भी दिया जाना चाहिए। संरक्षण की मात्रा के सम्बन्ध में मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यकों में अंतर किया गया। अपने राजनीतिक महत्व के आधार पर मुसलमानों ने अन्य अल्पसंख्यकों की तुलना में अपने लिए अधिक संरक्षण की मांग की थी। मुसलमानों ने अल्पसंख्यकों को भी संरक्षण की आवश्यकता से इन्कार कभी नहीं किया_ परन्तु 50 प्रतिशत सदस्यता की अपनी इस नयी मांग के द्वारा मुसलमान न केवल हिन्दुओं के बहुमत को कम करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि दूसरे अल्पसंख्यक वर्गों के राजनीतिक अधिकार में भी कटौती चाह रहे हैं। मुसलमान अब हिटलर की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं तथा जर्मनी में जिस महत्व की मांग हिटलर ने की थी, वे उसी महत्व की आकांक्षा यहाँ कर रहे हैं। 50 प्रतिशत भागीदारी की उनकी मांग, हिटलर के फ्ड्यूशलैंड उबेर ऐलेसय् और फ्लैबेंसरोमय् की मांग के सादृश्य ही है। चाहे अन्य अल्पसंख्यकों का कुछ भी हो।

उर्दू को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने की उनकी मांग भी उतनी ही विवेकहीन है। उर्दू सम्पूर्ण भारत में नहीं बोली जाती है। यही नहीं, सभी मुसलमानों की भी यह भाषा नहीं है। 6.8 करोड़ मुसलमानोंऽ में मात्र 2.8 करोड़ ही उर्दू बोलते हैं। उर्दू को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रस्ताव का अर्थ, खासकर मात्र 2.8 करोड़ मुसलमानों की भाषा को 4 करोड़ अन्य मुसलमानों पर और 32.2 करोड़ हिन्दुस्तानियों पर थोप देने जैसा ही होगा। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि जब भी संवैधानिक सुधार का कोई प्रस्ताव सामने आता है, मुसलमान अपने एक या अनेक राजनीतिक मांगें रख देते हैं। उनकी मांगों के इस प्रकार अंतहीन विस्तार पर केवल ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण हो सकता है, जो हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच किसी भी विवाद में अंतिम निर्णायक है। परन्तु यह कौन कह सकता है कि नयी मांगों के सम्बन्ध में निर्णायक की भूमिका अदा करने के लिए विवाद सुपुर्द करने पर, ब्रिटिश सरकार मुसलमानों के पक्ष में पक्षपात नहीं करेगी? मुसलमानों की मांगें जितनी बढ़ती हैं, प्रतीत होता है कि ब्रिटिश सरकार उतनी ही उदार हो जाती है। किसी भी तरह, विगत के अनुभव से यही प्रतीत होता है कि ब्रिटिशों का रवैय्या मुस्लिमों को जितना वे स्वयं मांगते हैं, उससे अधिक देने का रहा है। ऐसे दो दृष्टांत दिए जा सकते हैं।

एक दृष्टांत का सम्बन्ध लखनऊ समझौते से है। प्रश्न यह था कि क्या ब्रिटिश सरकार को समझौते का अनुमोदन करना चाहिए था। मौन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन के प्रणेता इसे स्वीकार करने के इच्छुक नहीं थे और इस बात के बहुत उपयुक्त कारण भी थे। लखनऊ समझौते में जितनी महत्ता मुसलमानों को दी गयी थी, संयुत्तQ प्रतिवेदन में उसके बारे में इस प्रकार का विचार व्यक्त किया गया हैः-

ऽ ये आंकड़े 1921 की जनगणना से संबंधित हैं।