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साम्प्रदायिक आक्रामकता 263

‘‘अब इस महत्ताप्राप्त स्थिति पर यह आपत्ति की जा सकती है कि यदि इसके

बाद से कोई अन्य सम्प्रदाय अलग प्रतिनिधित्व की मांग करता है, तब गैर-मुस्लिम

सीटों में कमी करके ही इसकी पूर्ति की जा सकती है, या फिर गैर-मुस्लिम

और मुस्लिम सीटों में दर-आधारित कमी करके की जा सकती है। किन्तु हिन्दू

और मुसलमानों में, इस सम्बन्ध में क्या प्रक्रिया अपनायी जाए इस पर सहमति

होगी, इसकी कम ही सम्भावना है। इसलिए उन कारणों से जिनका आगे चलकर

स्पष्टीकरण हम कर रहे हैं, मुसलमानों के लिए अलग प्रतिनिधित्व की व्यवस्था

कायम रखने को सहमति प्रदान करते हैं, तथापि जो खास प्रस्ताव इस सम्बन्ध में

अनुमोदन के लिए हम लोगों के सामने रखे गये हैं उनके संदर्भ में हम अपनी

उपर्युत्तQ सहमति को उस समय तक स्थगत रखते हैं जब तक हम यह पता नहीं

चला लें कि दूसरे हितों पर उनका क्या प्रभाव पड़ता है और इस सम्बन्ध में क्या

व्यवस्था की जाती है।य्ऽ

लखनऊ समझौता में इस गंभीर त्रुटि के रहते हुए भी भारत सरकार ने अपने शासकीय पत्र व्यवहार में जिसका प्रसंग ऊपर दिया गया है, समझौते की शर्तों को, जहाँ तक बंगाल के मुसलमानों का सम्बन्ध है, बेहतर बनाने की सिफारिश की है। इसका कारण पढ़ने पर बड़ा विचित्र लगता है। भारत सरकार ने तर्क दिया है किः-

फ्मुस्लिम प्रतिनिधित्व जिसे वे (समझौते के रचयिता) बंगाल के लिए

प्रस्तावित कर रहे हैं स्पष्टतः अपर्याप्त है। यह शंका वाली बात है कि

पूर्वी बंगाल की मुस्लिम जनसंख्या के दावों पर क्या पर्याप्त बल उस

समय दिया गया था जब कांगे्रस-लीग सहमति बनने की प्रक्रिया में

थी। पूर्वी बंगाल के मुसलमान सुस्पष्ट् रूप से एक पिछड़े हुए और

दरिद्र समुदाय हैं। 1912 में पे्रजीडेन्सी का पुनः विभाजन उनके लिए

गहरी निराशा की घटना थी, तथा हम लोग यह चाहेंगे कि उदारतापूर्वक

उनके हितों का साधन किया जाए। बंगाल के मुसलमानों को उनकी

जनसंख्या के अनुपात में, किन्तु इसके अधिक नहीं, 34 (समझौते के

अंतर्गत उन्हें देय) के बजाय 44 सीटें हमारे द्वारा आवंटित की जानी

चाहिए।य् [†]

ऽ मीन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट, 1918, पैरा 163

† भारत सरकार समझती थी कि पंजाब के साथ भी न्याय नहीं हुआ है। परन्तु चूंकि यहां बंगाल की तरह

का कोई विशेष कारण नहीं था, अर्थात् विभाजन का बिगड़ना, उसने पंजाब के लिए समझौते में निर्धारित

सीटों से अधिक की प्रस्थापना नहीं की।