11. सांप्रदायिक आक्रामकता - Page 273

264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

भारत सरकार ने बंगाल के मुसलमानों के प्रति यह जो उत्साह प्रदर्शित किया, ब्रिटेन की सरकार इससे सहमत नहीं हुई। उसने यह महसूस किया कि बंगाल के मुसलमानों को आवंटित सीटें एक समझौते का परिणाम थे, अतः सोदेबाजी को बेहतर बनाने के ख्याल से किए गए हस्तक्षेप के कारण जबकि समझौते की प्रामाणिकता के सम्बन्ध में कोई विवाद नहीं था, यह अवधारणा बन सकती थी कि ब्रिटेन की सरकार कुछ विशेष अर्थों में और कुछ विशेष कारणों से मुसलमानों के प्रति मित्रवत थी। सीटों में इस बढ़ोत्तरी को प्रस्तावित करते समय, भारत सरकार ने उन कारणों को ध्यान में नहीं रखा, जिनकी वजह से बंगाल और पंजाब में मुसलमानों को, समझौते में जनसंख्या बल के अनुसार सीटें दी जा सकी थीं। लखनऊ समझौता इस सिद्धांत पर आधारित था कि किसी सम्प्रदाय को उसके बहुमत के आधार पर संरक्षण नहीं दिया जाएगा, किन्तु इसकी धज्जियां उड़ा दी गयी हैं। सम्प्रदाय जब अल्पसंख्यक होता है, तभी संरक्षण का यह हकदार होता है। लखनऊ समझौते का सिद्धांत यही था। बंगाल और पंजाब में मुसलमान सम्प्रदाय अल्पसंख्यक नहीं था, इसीलिए उसी तरह के संरक्षण का हकदार भी नहीं था जैसा इसे उन प्रान्तों में जहाँ यह अल्पसंख्यक था दिया गया। बहुसंख्यक होते हुए भी, बंगाल और पंजाब में मुसलमानों ने अलग निर्वाचक-मण्डल की आवश्यकता महसूस की। लखनऊ समझौते में क्रियाशील सिद्धांत के अनुसार इसके लिए वे तभी हकदार हो सकते थे जब वे अपने को अल्पसंख्यक में तब्दील कर देते। यही कारण है कि बंगाल और पंजाब में मुसलमानों को, उनके हक के अनुसार बहुसंख्या में सीटें नहीं मिलीं, जिसके वे अपनी जनसंख्या के बल पर पाने के हकदार थे।ऽ

बंगाल के मुसलमान जितना स्वयं मांग रहे थे, उन्हें उससे अधिक दे देने का भारत सरकार का प्रस्ताव स्वीकृत नहीं हो सका। परन्तु भारत सरकार ऐसा करने का प्रयास कर रही थी, यह तथ्य उसके इसी रूझान के सबूत हैं।

दूसरा अवसर है जब ब्रिटेन की सरकार ने 1932 में साम्प्रदायिकता पर सम्बन्धित फैसला अपनी मध्यस्थता की हैसियत से दिया जिसमें जितना उन्होंने मांगा उससे

ऽ निस्संदेह समझौते में भागीदार होने के नाते मुसलमान इस बात को भलीभांति समझते थे। भारत सरकार

विधेयक, 1919, पर संसद द्वारा नियुक्त संयुक्त समिति के समक्ष साक्ष्य देते समय श्री जिन्ना ने यह कहा

थाः फ्बंगाल में मुसलमान बहुसंख्या में हैं, और तर्क प्रस्तुत किया गया कि कोई भी बहुसंख्यक वर्ग या

समुदाय पृथक निर्वाचक-मंडल का दावा नहीं कर सकता, क्योंकि पृथक निर्वाचन-मंडल अल्पसंख्यकों के

रक्षण के लिए है। परन्तु उसके उलट यह तर्क भी बिल्कुल सही है कि जबकि संख्या में हम बंगाल में

अधिक हैं, तथापि मतदाताओं के रूप में हमारी संख्या कम है जिसका कारण गरीबी, पिछड़ापन इत्यादि

है। यह कहा गया था कि ठीक है तब चालीस प्रतिशत निर्धारित कर दीजिए, क्योंकि यदि कसौटी पर

आंका जाएगा तब चालीस प्रतिशत भी प्राप्त नहीं होता। तब फिर दूसरे प्रान्तों में हम फायदे की स्थिति

में हैं।’’