साम्प्रदायिक आक्रामकता 267
हैं, तब ही मुसलमान पृथक निर्वाचक-मण्डल ख्1, के प्रस्ताव को छोड़ने पर सहमत होंगे। इससे प्रमाणित होता है कि अलग निर्वाचक-मण्डल को मुसलमान बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानते थे। उसे वे अपनी दूसरी मांगों को मनवाये जाने के लिए मात्र बहाना मानते हैं।
अनुचित लाभ उठाने की इस प्रवृत्ति का दूसरा प्रमाण मुसलमानों द्वारा गोहत्या के अधिकार और मस्जिदों के पास बाजे-गाजे की मनाही की मांग से मिलता है। धार्मिक उद्देश्य से गो-बलि के लिए, मुस्लिम कानूनों में कोई बल नहीं दिया गया है, और जब वह ‘मक्का’ और ‘मदीना’ तीर्थ-यात्रा पर जाता है, गो-बलि नहीं करता है। परन्तु भारत में दूसरे किसी पशु की बलि देकर वे संतुष्ट नहीं होते हैं। सभी मुस्लिम देशों में किसी मस्जिद के सामने से गाजे-बाजे के साथ बिना आपत्ति के गुजर सकते हैं। यहाँ तक कि अफगानिस्तान में भी जहां धर्म-निरपेक्षीकरण नहीं किया गया है, मस्जिदों के पास गाजे-बाजे पर आपत्ति नहीं होती है। परन्तु भारत में मुसलमान इस पर आपत्ति करते हैं, मात्र इसलिए कि हिन्दू इसे उचित मानते हैं। तीसरी बात, मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर-तरीके अपनाया जाना है। दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि गुंडागर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है। चेकों ख्2, के विरुद्ध सुडेटेन जर्मनों ने जिन तौर-तरीकों को अपनाया था वे उसका जानबूझकर तथा समझते हुए अनुकरण करते प्रतीत हो रहे हैं। जब तक मुसलमान आक्रामक थे, हिन्दू सहनशील बने रहे, तथा संघर्ष में, मुसलमानों से अधिक नुकसान हिन्दुओं को उठाना पड़ा। परंतु अब हिन्दुओं ने भी जवाबी आक्रमण करना सीख लिया है, और अब वे मुसलमान को छुरा घोपने में किसी प्रकार का संकोच महसूस नहीं करते हैं। प्रत्याक्रमण के इस मनोभाव के कारण गुण्डागर्दी के खिलाफ गुण्डागर्दी का भद्दा दृश्य सामने आ रहा है।
इस समस्या का कैसे सामना किया जाए, इस पर सम्बन्धित लोगों को विचार करना चाहिए। हिन्दू महासभा के सीधे-सीदे राष्ट्रवादी लोग हैं जो यह विश्वास करते हैं कि हिन्दुओं को मुसलमानों को मिटा देने का संकल्पमात्र करने की आवश्यकता है, और वे रास्ते पर आ जाएंगे। दूसरी ओर, कांगे्रसी हिन्दू राष्ट्रवादी हैं जिनकी नीति उनके प्रति राजनीतिक सहिष्णुता और तुष्टीकरण करने की रहती है, चूंकि वे यह
- हिन्दुओं का दुर्भाग्य यह था कि उन्हें संयुक्त निर्वाचक-मंडल नहीं मिला जबकि मुसलमानों को रियायतें
दी गईं।
- अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के कराँची अधिवेशन में श्री जिन्ना आर-सर अब्दुल्ला हारून दोनों ने भ
ारतीय मुसलमानों की तुलना मुस्लिम के फ्सुडेटेनय् से किया जो वही कर सकता था जैसा कि सुडेटेन
जर्मनों ने चेकोस्लोवाकिया के विरुद्ध किया था।