11. सांप्रदायिक आक्रामकता - Page 277

268 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

विश्वास करते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्त करने का लक्ष्य उनके समर्थन के बिना नहीं प्राप्त किया जा सकता।

हिन्दू महासभा की योजना किसी भी प्रकार एकता कायम करने की नहीं है। इसके विपरीत, यह निश्चित रूप से प्रगति में रुकावट पैदा करेगी। हिन्दू महासभा के अध्यक्ष का नारा फ्हिन्दुस्तान हिन्दुओं के लिएय् न केवल अहवादी है बल्कि नितांत मूर्खतापूर्ण है। प्रश्न फिर भी यह उठता है कि क्या कांगे्रस का तरीका सही है। मुझे लगता है कि दो बातों को समझने में कांगे्रस से चूक हुई है। पहली बात जिसे कांगे्रस समझ नहीं सकी वह यह है कि तुष्टीकरण और समझौते में फर्क होता है, और यह फर्क बुनियादी किस्म का होता है। तुष्टीकरण का अर्थ होता है, आक्रमणकारी के द्वारा लगायी गयी आग, लूट, बलात्कार और हत्या से प्रभावित हुए निर्दोष लोगों पर किए गए अपराधों की अनदेखी करके, अपराधियों को समझौते के मार्ग पर लाना, जब कि समझौते का अर्थ होता है लक्ष्मण रेखा का निर्धारण करना, जिसका दोनों में से कोई भी पक्ष उल्लंघन नहीं कर सकता। तुष्टीकरण से आक्रमणकारी की महत्वाकांक्षाओं और मांगों पर अंकुश नहीं लगता है। किन्तु समझौता अंकुश लगाता है। दूसरी बात जिसे कांगे्रस समझने में असमर्थ रही है वह यह है कि छूट देने की उसकी नीति के कारण मुस्लिम आक्रामकता में वृद्धि हुई है तथा जो बात इससे भी बुरी हुई है वह यह है कि मुसलमान इसे हिन्दुओं के पराजय-भाव का एक चिन्ह मानते हैं। जिस प्रकार कि तुष्टीकरण की नीति के कारण मित्रराष्ट्र एक खतरनाक स्थिति में पड़ गये थे, उसी प्रकार की परिस्थितियों से हिन्दू घिर जाएँगे। सामाजिक निष्क्रियता की बुराई से कम गम्भीर यह बुराई नहीं होगी। तुष्टीकरण निश्चय ही इस परिस्थिति की अभिवृद्धि करेगा। इसका एकमात्र वैकल्पिक उपाय है समझौता करना। यदि समझौते का परिणाम पाकिस्तान ही होता है, तब यह मामला गम्भीरतापूर्वक विचार करने योग्य है। इस मुद्दे पर समझौता होने से लगातार तुष्टीकरण की नीति का समापन हो जाएगा और उन सभी लोगों द्वारा इसका स्वागत किया जाएगा जो मुसलमानों के हिन्दुओं के प्रति बढ़ती हुई राजनीतिक तृष्णा से उत्पन्न खतरे की अपेक्षा समझौते से उत्पन्न शांति और चैन चाहते हैं।