11. सांप्रदायिक आक्रामकता - Page 278

अध्यायः 12

राष्ट्रीय कुंठा

I

यदि किसी भारतीय से पूछा जाए कि देश के लिए सर्वोपरि नियति क्या होनी चाहिए, तो वह क्या जवाब देगा? प्रश्न महत्वपूर्ण है, और इसका उत्तर निश्चय ही ज्ञानप्रद होगा।

अन्य बातें समान होते हुए, निस्संदेह प्रत्येक भारतीय, जिसे अपने देश पर गर्व है, कहेगा एक अखंड और स्वतंत्र भारत ही मेरे देश का आदर्श भविष्य है। परन्तु यह कहना भी सत्य है कि जब तक हिंदू और मुसलमान समान रूप से इसे स्वीकार नहीं करते, तब तक यह केवल एक पवित्र इच्छा ही बनी रहेगी, कभी वास्तविक स्वरूप ग्रहण नहीं कर पाएगी। पर क्या यह केवल कुछ लोगों की पावन इच्छा ही है, या एक लक्ष्य है जिसे प्राप्त करने का प्रयास सभी को करना है?

जहां तक राजनीतिक उद्देश्यों के एलानों का संबंध है, सभी राजनीतिक दल इस बात पर सहमत हैं और सभी इसकी घोषणा कर चुके हैं कि भारत के उत्तरोत्तर राजनीतिक विकास-क्रम का उद्देश्य है स्वतंत्रता या स्वाधीनता। कांगे्रस ने ही सर्वप्रथम यह घोषणा की थी कि उसका लक्ष्य भारत के लिए राजनीतिक स्वाधीनता प्राप्त करना है। दिसंबर 1927 के मद्रास अधिवेशन में कांगे्रस ने एक विशेष संकल्प में यह घोषण् ा की थी कि भारत की जनता [*] का लक्ष्य है संपूर्ण राष्ट्रीयता स्वतंत्रता। हिंदू महासभा 1932 तक यह मानकर संतुष्ट थी कि भारत के राजनीतिक विकास-क्रम का उद्देश्य

ऽ कांगे्रस का सिद्धांत मद्रास में नहीं बदला। यह 31 दिसंबर, 1929 में कांगे्रस के लाहौर अधिवेशन में

बदला गया। मद्रास अधिवेशन में आजादी के लिए केवल एक संकल्प पारित किया गया था। कांगे्रस

के कलकत्ता अधिवेशन में, जो दिसंबर 1928 में हुआ था, श्री गांधी और कांगे्रस-अध्यक्ष दोनों ने

घोषणा की कि वे भारत को स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा देने पर राजी हो जाएंगे, यदि अंगे्रज सरकार इसे

31 दिसंबर, 1929 की आधी रात तक दे दे।