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एक राष्ट्र का अपने घर के लिए आह्वान

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की पृथकता संबंधी तुर्की-नीति के परिणाम तो और भी अधिक गंभीर थे।

उससे पूरब का विनाश हुआ। सालोनिका अथवा स्मीइरना जैसे नगरों को ही

लें। आप पाएंगे कि पांच-छह समुदायों में से प्रत्येक की अपनी ही स्मृतियां

हैं और उनमें शायद ही कोई बात सांझा हो। परंतु राष्ट्र का सार-तत्व तो

यह है कि उसके सभी सदस्यों में कई समानताएं हों और यह भी कि वे

सभी अनेक बातों को विस्मृत कर चुके हों। कोई भी फ्रांसिसी नागरिक

यह नहीं जानता कि वह वर्गाडियन है, एलना है अथवा विसिगोवा है। हर

फ्रांसिसी नागरिक को सेंट वर्थोलोमेव और तेरहवीं शताब्दी में दक्षिण में

हुए नरसंहारों को भूल जाना चाहिए। फ्रांस में ऐसे दस परिवार भी नहीं हैं

जो फ्रांसिसी मूल का प्रमाण पेश कर सकें, और यदि ऐसे प्रमाण दिए भी

जाएं तो निश्चित रूप से दोषपूर्ण होंगे, क्योंकि हजारों ऐसी अज्ञात विषमताएं

होंगी जो समग्र आनुवंशिक प्रणाली को ही असफल बनाने में सक्षम हैं।य्

खेद का विषय यह है कि दोनों समुदाय अपने अतीत को सर्वथा भूल नहीं सकते अथवा उसका उन्मूलन भी नहीं स्वीकार कर सकते। उनका अतीत उनके धर्म में समाहित है और उनमें से प्रत्येक का अपने अतीत को विस्मृत करना धर्म को त्यागना है। इसलिए ऐसा होने की आशा संजोना भी मात्र कपोल-कल्पना है।

सामूहिक ऐतिहासिक घटनाक्रमों के अभाव में यह हिंदू दृष्टिकोण कि हिंदू और मुसलमान एक राष्ट्र हैं, धूल-धूसरित हो जाता है। उसे कायम रखना मतिभ्रम बनाए रखना है। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एकता की ऐसी कोई उत्कट लालसा नहीं है, जैसी कि भारत के मुसलमानों के बीच है।

यह कहना निरर्थक है कि मुसलमानों का एक राष्ट्र होने का दावा उनके नेताओं की परवर्ती सोच का परिणाम है। आरोप के तौर पर तो यह सच है। मुसलमान अब तक अपने आपको एक समुदाय कहने में ही पूर्ण संतुष्ट रहते थे। यह तो हाल में ही हुआ है कि उन्होंने अपने आपको एक राष्ट्र कें रूप में पेश करना शुरू कर दिया है। परन्तु किसी व्यक्ति के इरारों पर चोट करने से ही उसके सिद्धांत का खंडन नहीं हो जाता। यह कहना कि मुसलमान खुद को कभी समुदाय कहते थे, अतएव उन्हें अब स्वयं को एक राष्ट्र के रूप में संबोधित किए जाने से रोका जा सकता है, राष्ट्रीय अनुभूति के रहस्यपूर्ण मनोवैज्ञानिक कार्यकरण के बारे में गलतफहमी पालना है। ऐसी दलील का आधार यह पूर्वानुमान है कि जहां कहीं भी ऐसे लोग रहते हैं जिनमें एक राष्ट्र का गठन करने वाले तत्व मौजूद हैं, उनमें राष्ट्रीयता की वह भावना अभिव्यक्त होनी ही चाहिए जो एक स्वाभाविक परिणति है, और यदि कुछ समय के लिए वे उसे अभिव्यक्त करने में असफल रहें, और बाद में एक राष्ट्र होने का दावा करें, तो वह सारहीन है। परन्तु इस तरह की धारणा के लिए कोई ऐतिहासिक साक्ष्य