11. सांप्रदायिक आक्रामकता - Page 281

272 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

यद्यपि अंगे्रज मुसलमानों के दुश्मन हैं, फिर भी इस समय हमारी लड़ाई

अंगे्रजों से नहीं हैं। सर्वप्रथम हमें मुस्लिम लीग के जरिए हिंदुओं से कोई

समझौता करना होगा। उसके बाद ही हम आसानी से अंगे्रजों को बाहर खदेड़

सकेंगे और भारत में मुस्लिम शासन स्थापित कर पाएंगे।

सावधान रहो! कांगे्रसी मौलवियों के जाल में मत फंसो, क्योंकि

मुस्लिमों की दुनिया कभी भी 22 करोड़ हिंदू दुश्मनों के हाथ में सुरक्षित

नहीं है।य्ऽ

‘आनंद बाजार पत्रिका’ के संवाददाता द्वारा तैयार किए गए मौलाना आज़ाद सुभानी ने अपने भाषण में कांगे्रसी सूबों में मुस्लिम के उत्पीड़न की अनेक काल्पनिक घटनाओं का वर्णन कियाः

फ्उन्होंने कहा कि प्रांतीय स्वायत्त शासन के लागू होने के बाद जब कांगे्रस

ने मंत्रिमंडल गठित करना स्वीकार किया, तो उन्हें लगा कि हिंदू बहुल

कांगे्रस के हाथों में मुसलमानों के हित सुरक्षित नहीं रहेंगे। परंतु हिंदू नेता

उदासीन थे और इसलिए उन्होंने कांगे्रस छोड़ दी और मुस्लिम लीग में

शामिल हो गए। जिस बात का उन्हें डर था, वही कांगे्रसी मंत्रियों द्वारा

अपनाई गई। इस भविष्य के अनुमान को ही राजनीति कहते हैं। अतः वह

एक महान राजनीतिज्ञ थे। वह सोच रहे थे कि भारत को स्वतंत्रता मिलने

से पूर्व हिंदुओं के साथ किसी भी प्रकार का समझौता होना आवश्यक है।

चाहे वह बलपूर्वक हो या मित्रता से, अन्यथा हिंदू, जो कि 700 वर्ष तक

मुसलमानों के गुलाम रहे, मुसलमानों को ही गुलाम बना लेंगे।य्

हिंदुओं को पता है कि मुसलमान क्या सोच रहे हैं, और वे इस संभावना से भयभीत हैं कि मुस्लिम उन्हें गुलाम बनाने में स्वतंत्रता का उपयोग कर सकते हैं। फलस्वरूप, हिंदू स्वतंत्रता को भारत के राजनीतिक विकास का अंतिम लक्ष्य बनाने के प्रति निरूत्साहित हैं। यह आशंका उन लोगों को नहीं है जो अपना निर्णय देने के योग्य नहीं हैं। इसके विपरीत, जिन हिंदुओं ने स्वतंत्रता के लक्ष्य की ओर बढ़ने की बुद्धिमता के प्रति अपनी आशंका व्यक्त की है, वे वही हैं जो मुसलमानों के संपर्क में रहने के कारण अपना मत देने में सक्षम हैं।

श्रीमती एनी बेसेंट कहती हैंः

फ्भारत के मुसलमानों के संबंध में एक दूसरा गंभीर प्रश्न और उठता है।

यदि मुसलमानों और हिंदुओं के बीच वैसे ही संबंध रहते, जैसे लखनऊ

ऽ आनंद बाजार पत्रिका में बंगला भाषा में छपा ‘हिन्दुस्तान स्टैंडर्ड’ के संपादक ने मेरे लिए इस भाषण

का अनुवाद किया जो यहां दिया जा रहा है।