11. सांप्रदायिक आक्रामकता - Page 282

राष्ट्रीय कुंठा

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में हुआ करते थे, तो यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण नहीं रह जाता। यद्यपि यह प्रश्न स्वतंत्र भारत में देर-सवेर अवश्य ही उठता। परंतु खिलाफत आंदोलन के बाद से परिस्थितियां बदल गई हैं और खिलाफत जिहाद को बढ़ावा देने से भारत को पहुँची कई क्षतियों में एक यह भी है कि मुसलमानों के दिल में ‘नास्तिकों’ के विरुद्ध नंगी और बेशर्मी की हद तक नफरत पैदा हुई जो कभी पहले होती थी। हम देखते हैं कि राजनीति में तलवार का वही पुराना मुस्लिम धर्म लोगों की भावनाओं को उकसा रहा है, हम देख रहे हैं शताब्दियों पुरानी वही मुस्लिम धर्म की श्रेष्ठता का दंभ। हमने देखा कि शताब्दियों की विस्मृति के बावजूद अलगाव की वह प्राचीन भावना पुनर्जीवित हो गई है, जिसमें जजीरूत अरब अर्थात् अरब द्वीप के संबंध में यह दावा है कि यह मुसलमानों का पवित्र भू-खंड है और इसे गैर-मुस्लिम के अपवित्र पांव गंदा न करें। हमने मुसलमान नेताओं को यह कहते सुना है कि यदि अफगान भारत पर आक्रमण करें तो वे अपने धर्म को मानने वाले अफगानों की सहायता करेंगे और उन हिंदुओं की हत्या करेंगे जो दुश्मनों से अपनी मातृभूमि की रक्षा करेंगे। हमें यह सोचने पर विवश कर दिया गया है कि मुसलमानों की पहली वफादारी मुस्लिम देशों के प्रति है, हमारी मातृभूमि के प्रति नहीं। हमें यह भी मालूम हुआ है कि उनकी उत्कट इच्छा है ‘अल्लाह का साम्राज्य’ स्थापित करना, न कि संसार के परमात्मा का, जिसे अपने सभी प्राणियों से समान पे्रम है। अल्लाह के आदेश को वे अपने किसी पैगंबर के आदेश में देखते हैं, और उसी के अनुसार यह तय करते हैं कि खुदा पर अविश्वास करने वालों के साथ कैसा सुलूक किया जाये। प्राचीन हिब्रूज के मोजेक जेहोवा की तरह आज वे पैगम्बर द्वारा प्रतिपादित धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता के लिए पुराने मुसलमानों की भांति लड़ रहे हैं यद्यपि आज की दुनिया उन धर्म व्यवस्थाओं से कहीं आगे जा चुकी है, जिनमें एक इंसान द्वारा ईश्वर के आदेश दिए जाते थे। मुस्लिम नेताओं का यह दावा कि मुसलमानों को अपने विशेष पैगम्बर के कानून का पालन करना चाहिए और अपने राज्य के कानूनों, जिसमें वे रहते हैं, को दरकिनार कर देना चाहिए, राष्ट्र और नागरिक व्यवस्था के लिए घातक है। यह उन्हें बुरा नागरिक साबित करता है, क्योंकि उनकी निष्ठा का केंद्र राष्ट्र से बाहर है और जब तक वे मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली जैसे मुस्लिम समुदाय के मान्य नेताओं के विचारों से मतैक्य रखेंगे, उन पर उनके सह-नागरिक विश्वास नहीं करेंगे। यदि भारत स्वतंत्र हुआ तो मुस्लिम जनसंख्या वाला वह क्षेत्र जिसमें रह रहे अज्ञानी