राष्ट्रीय कुंठा
आतंक के बारे में भी विचार करना होगा।य् ख्1,
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इसी तरह की आशंका लाला लाजपतराय ने श्री सी.आर. दास को लिखे अपने पत्र में व्यक्त की थीः
फ्एक बात और है, जो मुझे बहुत दिनों से कष्ट दे रही है, जिसे मैं
चाहता हूं कि आप बहुत ध्यान से सोचें, और वह है हिंदू-मुस्लिम
एकता। पिछले 6 महीनों में मैंने अपना अधिकांश समय मुस्लिम इतिहास
और मुस्लिम कानून को पढ़ने में लगाया है और मैं इस निष्कर्ष पर
पहुंचा हूं कि यह न तो संभव है और न ही व्यावहारिक है। असहयोग
आंदोलन में मुस्लिम नेताओं की ईमानदारी व निष्ठा को मानते हुए और
उसे स्वीकारते हुए, मैं समझता हूं कि उनका धर्म उनके मार्ग में एक
किस्म से रुकावट डालता है। आपको याद होगा, हकीम अजमल खां
और डॉ. किचलू से उस विषय में जो मेरी बातचीत हुई थी, उसकी
रिपोर्ट मैंने आपको कलकत्ता में दी थी। हकीम साहेब से बेहतर कोई
मुसलमान हिंदुस्तान में नहीं है। परंतु क्या कोई अन्य मुस्लिम नेता कुरान
के विपरीत जा सकता है? मैं तो केवल यही सोचता हूं कि इस्लामिक
कानून के बारे में मेरा ज्ञान सही नहीं है और ऐसा ही सोचकर मुझे राहत
मिलती है। परंतु यदि यह सही है, तो यह बात साफ है कि हम अंगे्रजों
के विरुद्ध एक हो सकते हैं, परंतु ब्रिटिश रूपरेखा के अनुसार हिंदुस्तान
पर शासन चलाने के लिए एक नहीं हो सकते। हम जनतांत्रिक आधार
पर हिंदुस्तान पर शासन चलाने के लिए एक नहीं हो सकते। फिर उपाय
क्या है? मुझे हिंदुस्तान के सात करोड़ हिंदुओं का डर नहीं है, परंतु मैं
सोचता हूँ कि हिंदुस्तान के सात करोड़ मुसलमान और अफगानिस्तान,
मध्य एशिया, अरब, मिसोपोटामिया और तुर्की के हथियारबंद गिरोह
मिलकर अप्रत्याशित स्थिति पैदा कर देंगे। मैं ईमानदारी से हिंदू-मुस्लिम
एकता की आवश्यकता और वांछनीयता में विश्वास करता हूं। मैं मुस्लिम
नेताओं पर भी पूरी तरह से विश्वास करने को तैयार हूं, परंतु कुरान और
हदीस की निषेधाज्ञा के बारे में क्या कहें? ये नेता उनका उल्लंघन नहीं
कर सकते। तो क्या हम बर्बाद हो जाएंगे? मैं ऐसी बात नहीं सोचता।
मैं आशा करता हूं कि सुशिक्षित और बुद्धिमान इस कठिनाई से बच
निकलने का कुछ उपाय ढूंढेंगे।य् ख्2,
दि फयूचर ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स, पृ. 301-305
इंद्र प्रकाश द्वारा लिखित ‘लाइफ ऑफ सावरकर’ से उद्धृत।