12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 286

राष्ट्रीय कुंठा

277

अपने वार्षिक अधिवेशन अहमदाबाद में किए थे। प्रत्येक अधिविशेन में स्वतंत्रता के पक्ष में प्रस्ताव पारित किए। प्रत्येक के प्रस्तावों की क्या नियति हुई, यह बड़ी रोचक बात है।

कांगे्रस के अध्यक्ष हकीम अजमल खां थे, जिन्होंने श्री सी.आर. दास की जगह पर अध्यक्षता की, क्योंकि श्री सी.आर. दास को कांगे्रस के अधिवेशन के पूर्व ही सरकार द्वारा गिरफतार कर लिया गया था और वह अध्यक्षता नहीं कर सके थे। कांगे्रस के मौलाना हसरत मोहानी ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसमें कांगे्रस के लक्ष्य में परिवर्तन करने पर जोर दिया गया। उक्त प्रस्ताव से संबंधित कार्यवाही का सारांश इस प्रकार हैः

मौलाना हसरत मोहानी ने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव रखते हुए उर्दू में

एक लंबा और भावावेशपूर्ण भाषण दिया। उन्होंने कहा कि यद्यपि स्वराज

का आश्वासन उन्हें पिछले वर्ष दिया गया था, खिलाफत और पंजाब में

ज्यादतियों का समाधान एक साल के अंदर करने को कहा गया था, परंतु

अभी तक इस विषय में कुछ भी नहीं हुआ है। अतः इस योजना का

अनुसरण करने का कोई औचित्य नहीं है। यदि ब्रिटिश साम्राज्य या ब्रिटिश

राष्ट्रमंडल के अंतर्गत रहकर उन्हें स्वाधीनता नहीं मिली तो उनका सोचना

था कि आवश्यकता पड़ने पर उन्हें ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का परित्याग करने में

कोई संकोच नहीं होना चाहिए। लोकमान्य तिलक के शब्दों में - ‘स्वराज

हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, और कोई भी सरकार जो बोलने और कर्म

करने के मूल अधिकार से वंचित करती है, वह लोगों की निष्ठा की

हकदार नहीं है। उपनिवेशीय स्वशासन जन्मसिद्ध स्वाधीनता का स्थान नहीं

ले सकता। जो सरकार सर्वश्री चितरंजन दास, पं. मोतीलाल नेहरू, लाला

लाजपतराय और अन्य विशिष्ट व्यक्तियों को जेल में ठूंस सकती है, वह

जनता से आदर की आकांक्षा करने की हकदार नहीं है। और चूंकि वर्ष

के अंत तक उन्हें स्वराज नहीं मिला इसलिए पूर्ण स्वतंत्रता की प्राप्ति के

लिए वे किसी भी माध्यम का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं। प्रस्ताव

इस प्रकार है -

‘भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस का लक्ष्य है भारत के लोगों द्वारा वैध और

शांतिपूर्ण तरीकों से स्वराज प्राप्ति या सभी विदेशी नियंत्रणों से मुक्त पूर्ण

स्वाधीनता।’ऽ

ऽ देखिए, दि इंडियन एनुअल रजिस्टर-1922, परिशिष्ट, पृ. 64-66