278 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
प्रस्ताव के पक्ष में जब कई प्रतिनिधि बोल चुके तब श्री गांधी प्रस्ताव के विरोध में आगे आए। प्रस्ताव का विरोध करते हुए श्री गांधी ने कहा -
फ्मित्रों, मैंने श्री हसरत मोहानी के प्रस्ताव के संबंध में कुछ शब्द कहे हैं। मैं अब आपसे यही कहना चाहता हूं कि जिस हलकेपन से इस प्रस्ताव को कुछ लोगों ने यहां लिया है, उससे मुझे दुःख है। मुझे दुःख इसलिए हुआ कि इसमें गैर-जिम्मेदाराना दृष्टिकोण झलकता है। हमें सभी पुरूषों और महिलाओं को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए नागपुर और कलकत्ता के दिनों को याद करना होगा और फिर हमें सोचना होगा कि एक घंटा पूर्व हमने क्या किया। एक घंटा पूर्व हमने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें खिलाफत और पंजाब में हुई गलतियों के बारे में अंतिम समझौते और कुछ निश्चित तरीके अपनाकर ब्रिटिश शासकों के हाथ से सत्ता का जनता के हाथों में अंतरण करने की बात कही गई है। क्या आप मिथ्या मुद्दों को उठाकर भारतीय वातावरण में धमाका करके उक्त स्थिति को मिटा देना चाहते हैं? मैं आशा करता हूं कि आप में से जिन्होंने पहले प्रस्ताव के पक्ष में मतदान दिया, इस प्रस्ताव पर मत देने से पहले पचास बार सोचेंगे। विश्व के चिंतनशील लोग हम पर आरोप लगायेंगे कि हम वास्तव में नहीं जानते कि हम कहां हैं। हमें अपनी सीमाओं को समझना चाहिए। हिंदुओं और मुसलमानों में असीम और अविच्छिन्न एकता हो। यहां कौन है जो निश्चित होकर कह सके कि हां, हिंदू-मुसलमान एकता अब भारतीय राष्ट्रीयता का एक अविच्छिन्न तत्व बन गया है? कौन मुझे यहां बताएगा कि पारसी और सिख और ईसाई और यहूदी और अछूत जिनके बारे में आपने आज दोपहर सुना-कौन मुझे बताएगा कि यही लोग इस विचार के खिलाफ नहीं उठ खड़े होंगे? ऐसा कदम उठाने से पहले, जिससे न तो आपकी साख बनेगी, न ही वह आपके लिए हितकर होगा, परंतु जिससे आपको अपूरणीय क्षति होगी, आपको पचास बार सोचना होगा। आइए, पहले हम सब अपनी शक्ति का संचय करें, हम अपनी गहराइयों को देखें। हमें उस पानी में नहीं जाना चाहिए, जिसकी गहराई हमें मालूम न हो_ और श्री हसरत मोहानी का यह प्रस्ताव हमें अनजाने गर्त में ले जाएगा। मैं आपको पूरे विश्वास के साथ कहता हूं कि यदि आप उस प्रस्ताव में विश्वास रखते हैं, जो आपने एक घंटा पहले पारित किया है, तो उसे रद्द कर दें। जो प्रस्ताव अब आपके सामने है, वह उस प्रस्ताव का, जो आपने एक घंटा पूर्व पारित किया है, प्रभाव मिटा देगा। क्या सिद्धांत इतने सरल हैं कि हम उन्हें कपड़ों की भांति अपनी मर्जी