राष्ट्रीय कुंठा
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से बदल दें? सिद्धांतों के लिए लोग मरते हैं और सिद्धांतों के लिए हर
युग में जीते हैं। क्या आप उस सिद्धांत को, जो नागपुर में आपने पूरे
विचार-विमर्श और चर्चा के बाद अंगीकृत किया, बदल देंगे? उस समय,
जब आपने यह सिद्धान्त स्वीकार किया, एक साल की कोई सीमा नहीं
थी। यह एक व्यापक सिद्धांत है, यह कमजोर और संपन्न सभी को साथ
लेकर चलता है। यदि आप मौलाना हसरत मोहानी के इस संकुचित सिद्धांत
को स्वीकार करते हैं, जो कि अपने गरीब भाइयों को नहीं स्वीकारता तो
आप अपने कमजोर भाइयों को सुरक्षा देने की विशेष स्थिति से वंचित हो
जायेंगे। अतः मैं पूरे विश्वास के साथ अनुरोध करता हूँ कि इस प्रस्ताव
को रद्द कर दें।य्
जब प्रस्ताव पर मत लिया गया, तो वह अस्वीकृत हो गया।
अखिल भारतीय खिलाफत कांफ्रेंस के अधिवेशन की अध्यक्षता भी हकीम अजमल
खां ने की। कांफ्रेंस की विषय-समिति में स्वतंत्रता के पक्ष में एक प्रस्ताव पेश किया गया। उस प्रस्ताव का क्या हुआ यह कार्यवाही के निम्नलिखित सारांश से स्पष्ट है। कार्यवाही की रिपोर्ट इस प्रकार हैः
फ्दूसरे दिन कांफे्रंस के स्थगित होने से पहले रात के ग्यारह बजे अध्यक्ष
हकीम अजमल खां ने घोषणा की कि कांफे्रंस की विषय-समिति श्री आजाद
सुभानी के प्रस्ताव पर, जिसका श्री हसरत मोहानी ने अनुमोदन किया,
बहुमत से यह निश्चय करती है कि सभी मुसलमानों और अन्य समुदायों
द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त करने और संपूर्ण स्वराज प्राप्त करने का
प्रयत्न किया जाए।
फ्प्रस्ताव में कहा गया कि क्योंकि ब्रिटिश सरकार की अटल नीति
और दृष्टिकोण को देखते हुए यह आशा नहीं की जा सकती कि ब्रिटिश
साम्राज्य जजीरात-उल-अरब तथा इस्लामी दुनिया को गैर-इस्लामी नियंत्रण
तथा प्रभाव से पूरी तरह स्वतंत्र होने देगा, जिसका अभिप्राय है कि खिलाफत
उस सीमा तक संभव नहीं जिस सीमा तक शरियत इसकी सुरक्षा चाहता है,
अतः खिलाफत की पक्की सुरक्षा और भारत की संपन्नता के लिए, ब्रिटिश
साम्राज्य का अंत करने के लिए प्रयत्न करना जरूरी है। इस ‘कांफे्रंस’ का
यह मत है कि इस प्रयत्न का एकमात्र तरीका मुसलमानों के लिए यह है
कि वे अन्य भारतीयों के साथ मिलकर भारत को पूर्ण रूप से स्वतंत्र कराएं_
और यह कांफे्रंस इस विचार की है कि मुसलमानों का विचार स्वराज के
बारे में वही है, अर्थात् संपूर्ण स्वराज, और भारत के अन्य निवासियों से
भी इसी विचार की अपेक्षा करती है।