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राष्ट्रीय कुंठा

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उस तानाशाही के योग्य हैं जिसे कांगे्रस ने उन्हें सौंपा है, परंतु वे यह भी

मानते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद भारत के लिए और मुस्लिम देशों के लिए

सबसे बड़ा खतरा है और उसे उनके सामने स्वतंत्रता का आदर्श रखकर

नष्ट करना होगा। श्री आज़ाद सुभानी के बाद कई वक्ता आए, जिन्होंने

उनका उसी लय में समर्थन किया।

फ्माननीय श्री रज़ा अली ने घोषणा की कि अध्यक्ष के इस निर्णय

की वजह यह थी कि लोग वह कदम नहीं उठाना चाहते थे, जो कांगे्रस ने

नहीं उठाया था। उन्होंने बिना समझे-बूझे बड़ी-बड़ी बातें कहने के विरुद्ध

उन्हें चेतावनी दी, और श्रोताओं को याद दिलाया कि यदि भारत को स्वतंत्रता

मिल जाए तो यह अभी उसे कायम रखने के योग्य नहीं हैं।

उन्होंने प्रश्न किया - उदाहरण के लिए कल यदि अंगे्रज चले जाएं

तो सेनाध्यक्ष कौन होगा। (एक आवाज़ ‘अनवर पाशा’)

वक्ता ने जोर देकर कहा कि वे किसी भी विदेशी को बर्दाश्त नहीं

करेंगे। वे एक भारतीय को सेनाध्यक्ष चाहते है।य्ऽ

स्वतंत्रता का प्रश्न मार्च 1923 में कांगे्रस के काकीनाडा अधिवेशन में पुनः उठाया गया, परंतु उसे सफलता नहीं मिली।

कांगे्रस के बेलगाम अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए 1924 में श्री गांधी ने कहाः

य्मेरे विचार में, यदि ब्रिटिश सरकार की मंशा वही है, जो वह कह रही

है और यदि वह ईमानदारी से समानता के लिए हमारी मदद करना चाहती

है, तो इससे हमें ज्यादा लाभ होगा, बजाए ब्रिटेन से संबंध विच्छेद करने

के। अतः मैं ब्रिटिश साम्राज्य के तहत स्वराज के लिए प्रयत्न करूंगा। परंतु

यदि ब्रिटेन ने गलती की तो आवश्यक होने पर हम सभी संबंध-विच्छेद

करने में नहीं हिचकिचाएंगे। अतः मैं संबंध विच्छेद करने का भार ब्रिटेन

के लोगों पर छोडूंगा।य्

1925 में श्री चितरंजन दास ने इस विषय को फिर उठाया। उसी वर्ष बंगाल प्रदेश सम्मेलन में उन्होंने अपने भाषण में स्वाधीनता के विचार पर करारी चोट करने के संदर्भ में उपनिवेश के दर्जे की अपेक्षा स्वतंत्रता के विचार को घटिया बताने का प्रयास कियाः

ऽ वही, परिशिष्ट, पृ. 78