282 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
फ्..............मेरे विचार में स्वतंत्रता का आदर्श स्वराज्य के आदर्श से संकीर्ण है। यह सही है कि यह निर्भरता के विपरीत है_ परंतु यह हमें अपने आप में कोई सकारात्मक आदर्श प्रस्तुत नहीं करता। मैं एक क्षण के लिए भी यह सुझाव नहीं दूंगा कि स्वतंत्रता स्वराज के समान है। सिर्फ स्वतंत्रता आवश्यक नहीं है, आवश्यक है स्वराज की स्थापना। कल भारत स्वतंत्र हो सकता है, इस मायने में कि ब्रिटेन के लोग हमें अपनी नियति पर छोड़ दें। परंतु उससे हमें वह नहीं मिलेगा जिसे मैं स्वराज समझता हूं। जैसा कि मैंने गया अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण में कहा था, भारत के सामने एक रोचक परंतु विषम समस्या है विभिन्न मतभेदों को समेकित करना, जिनसे हम भारत के लोगों का निर्माण हुआ है। समेकित करने की यह प्रक्रिया बड़ी लंबी, कठिन और श्रमसाध्य है, परंतु बिना इसके स्वराज संभव नहीं है.....................
फ्दूसरी ओर, स्वतंत्रता से आपको उस व्यवस्था की झलक नहीं मिलती जो स्वराज का सार है। समेकित करने के जिस कार्य का मैंने जिक्र किया, उसका अभिप्राय है उस स्वराज की स्थापना करना। परंतु एक बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि जिस व्यवस्था को हम स्थापित करना चाहते हैं, उसे भारत के लोगों की प्रतिभा, परंपरा और प्रकृति के अनुरूप होना होगा। मेरे विचार में स्वराज का अभिप्राय है, प्रथमतः भारत की विभिन्नताओं को समेकित करना, दूसरे हमें इस काम के लिए राष्ट्रीय परिपे्रक्ष्य में काम करना और दो हजार साल पीछे जाकर नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय प्रतिभा और प्रकृति के अनुरूप आगे बढ़ते हुए........................
फ्तीसरे, जो काम हमारे सामने है, हमें अपने रास्ते में किसी विदेशी ताकत को अवरोध उत्पन्न नहीं करने देना होगा। अतः हमें जो आदर्श आपके सामने रखना है, वह है स्वराज न कि सिर्फ स्वतंत्रता, जो स्वराज का विलोम हो सकती है। जब हमसे पूछा जाता है कि हमारी स्वतंत्रता का राष्ट्रीय आदर्श क्या है तो इसका एक ही उत्तर संभव है, और वह है ‘स्वराज’। मैं न तो ‘गृह शासन’ को और न ही ‘खुद की सरकार’ या स्वशासन को पसंद करता हूं। संभवतः यह शब्द स्वराज की परिधि में आते हैं। परंतु मेरी संस्कृति एक या दूसरे कारण से ‘शासन’ शब्द के खिलाफ है - चाहे ‘गृह शासन’ हो या ‘विदेशी शासन’।
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