12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 292

राष्ट्रीय कुंठा

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तब प्रश्न उठता है कि क्या यह आदर्श साम्राज्य के अंदर या उसके बाहर रहकर प्राप्त किया जा सकता है? कांगे्रस ने जो उत्तर हमेशा दिया है - फ्साम्राज्य के अंदर, यदि साम्राज्य हमारे अधिकार को मान्यता देता है_ और साम्राज्य से बाहर, यदि वह मान्यता नहीं देता, हमें अपना जीवन जीने का अवसर मिलना चाहिए - आत्मनिरीक्षण, आत्मविकास और जीवन-संतुष्टि का। प्रश्न हमारे जीवन जीने का है। यदि ब्रिटिश साम्राज्य हमारे राष्ट्र-जीवन के उन्नयन और विकास के लिए पर्याप्त अवसर देता है, तो मैं ब्रिटिश साम्राज्य को चुनूंगा। यदि, इसके विपरीत, ब्रिटिश साम्राज्य जगन्नाथ के रथ की तरह अपनी साम्राज्यवादी रफतार से हमें कुचलता है, तो ब्रिटिश साम्राज्य से बाहर स्वराज स्थापित करने के विचार का औचित्य है।

फ्वास्तव में, साम्राज्य का विचार हमें कई लाभों की जीवंत अनुभूति कराता है। उपनिवेश का दर्जा किसी भी तरह दासता नहीं है। यह वास्तव में सहयोग के सही अर्थ में भौतिक लाभ की भावना से उन लोगों की स्वैच्छिक मैत्री है, जो साम्राज्य के अंग हैं। स्वैच्छिक मैत्री में निश्चय ही अलग होने का अधिकार निहित है। युद्ध से पूर्व सामान्यतः यह माना जाता था कि साम्राज्य या उसका कोई अंग महान संघ के रूप में जीवित रह सकता है। यह महसूस किया जाता है कि आधुनिक परिस्थितियों में कोई राष्ट्र पृथक नहीं रह सकता, और डोमीनियन स्टेटस की स्थिति प्रत्येक इकाई को ब्रिटिश साम्राज्य के आत्मानुभव, आत्मोन्नति और आत्मसंपूर्ति का अधिकार भी देती है, इस तरह इसमें स्वराज के वह सभी तत्व निहित हैं, जिनका मैंने जिक्र किया है।

फ्मेरे लिए यह विचार आध्यात्मिक महत्व के कारण विशेष रूप से आकर्षक है। मैं विश्व-शांति के लिए विश्व के अंततः एक होने में विश्वास करता हूं, और मैं समझता हूं कि महान राष्ट्रमंडल, जिसे ब्रिटिश साम्राज्य कहते हैं विभिन्न जातियों का एक संयुत्तQ संगठन है, जिनमें प्रत्येक की अपनी ही जीवन पद्धति, विशिष्ट सभ्यता और विशिष्ट मानसिक दृष्टिकोण है। उन राजनीतिज्ञों को, जो उसका दिशानिर्देशन और संचालन करते हैं, राष्ट्रमंडल की विकट समस्याओं के निवारण में महान योगदान का अवसर मिलेगा। उससे विश्व को एक महान राष्ट्रसंघ-सूत्र में गूंथा जा सकेगा, जो कि मानवजाति का एक संघ होगा। परंतु यह तभी संभव है, जब राष्ट्रमंडल का संचालन राज्यवेत्ता करें क्योंकि इस वैचारिक विकास के लिए निश्चित रूप से त्याग की आवश्यकता है और इसमें निस्संदेह शासन के प्रलोभी