284 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
साम्राज्य के विचार को तिलांजलि दिया जाना निहित है। मैं समझता हूं कि
यह भारत के हित में होगा। विश्व के हित में भी यही होगा कि भारत
राष्ट्रमंडल के अंदर रहकर स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न करे और मानवता की
सेवा करे।य्
श्री दास ने न सिर्फ इस बात पर ही बल दिया कि डोमीनियन स्टेटस स्वतंत्रता से बेहतर है, अपितु एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने सम्मेलन में भारत के राजनीतिक विकास-क्रम के उद्देश्य पर निम्नलिखित संकल्प पारित करवायाः
फ्1. यह सम्मेलन घोषणा करता है कि स्वराज का राष्ट्रीय आदर्श है, भारत
राष्ट्र का अपने ढंग से जीवन जीने का अधिकार, अपने लिए आत्मनिरीक्षण
का अवसर और आत्मसंतुष्टि और विभिन्न तत्वों को समेकित करने की
स्वतंत्रता जिनसे अबाध और बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के भारत राष्ट्र
बनता है।
फ्2. यदि ब्रिटिश साम्राज्य ऐसे अधिकारों को मान्यता देता है, और
स्वराज-प्राप्ति में बाधा नहीं डालता है, और ऐसे सभी अवसर देता है, और
ऐसे अधिकारों को प्रभावी बनाने के लिए अपेक्षित त्याग करता है, तो यह
सम्मेलन भारत राष्ट्र से आग्रह करता है कि अपना स्वराज ब्रिटिश राष्ट्रमंडल
के तहत प्राप्त करे।य्
यह उल्लेखनीय है कि पूरे अधिवेशन के दौरान श्री गांधी उपस्थित थे, परंतु उनकी ओर से कोई असहमति नहीं आई। इसके विपरीत, उन्होंने श्री चितरंजन दास की बात का अनुमोदन किया।
इस पृष्ठभूमि में, यह संदेह कौन कर सकता है कि हिंदू डोमीनियन स्टेटस के और मुसलमान स्वतंत्रता के पक्ष में हैं। फिर भी यदि कोई संदेह रहता है, तो 1928 की नेहरू कमेटी की रिपोर्ट से मुसलमानों में जो प्रतिक्रिया हुई, वह संदेह उससे निरस्त हो जाता है। संविधान निर्माण के लिए कांगे्रस द्वारा नियुक्त नेहरू-समिति ने भारत के संवैधानिक ढांचे के लिए डोमिनियन स्टेटस का दर्जा स्वीकार किया और स्वाधीनता को नामंजूर कर दिया। नेहरू-कमेटी की रिपोर्ट पर कांगे्रस और मुस्लिम राजनीतिक संगठनों का दृष्टिकोण पठनीय है।
कांगे्रस ने 1928 के अपने कलकत्ता अधिवेशन में श्री गांधी द्वारा प्रस्तावित निम्नलिखित प्रस्ताव पारित कियाः
फ्यह कांगे्रस सर्वदलीय कमेटी की रिपोर्ट द्वारा अनुसंशित संविधान पर विचार
करके, भारत की राजनीतिक और सांप्रदायिक समस्याओं के निराकरण की