राष्ट्रीय कुंठा
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दिशा में इसे एक महान योगदान मानकर इसका स्वागत करती है, और
कमेटी की सर्वसम्मत सिफारिशों के लिए उसे बधाई देती है और मद्रास
कांगे्रस के संपूर्ण स्वतंत्रता संबंधी संकल्प का अनुसरण करते हुए कमेटी
द्वारा निर्मित संविधान का अनुमोदन करती है कि यह एक महान राजनीतिक
पहल है, विशेषकर इसलिए कि यह कदम देश की महत्वपूर्ण पार्टियों के
बीच सबसे बड़े समझौते का प्रतिनिधित्व करता है।
फ्राजनीतिक आवश्यकताओं का विचार करते हुए कांगे्रस इस
संविधान को पूर्णरूपेण अंगीकार करती है, यदि ब्रिटेन की संसद इसे 31
दिसंबर, 1929 या इससे पूर्व स्वीकार कर ले। परंतु यदि उक्त तिथि तक
इसे स्वीकार नहीं किया गया और यदि इससे पूर्व नामंजूर किया गया, तो
कांगे्रस अहिंसक असहयोग आंदोलन करेगी और देश से आग्रह करेगी कि
किसी भी प्रकार के कर का भुगतान नहीं किया जाए या ऐसे कुछ तरीके
अपनाएगी जिनका निर्णय बाद में किया जाए। इसके साथ, इस संकल्प का
कोई भी अंश कांगे्रस के नाम पर चलाए जाने वाले संपूर्ण स्वतंत्रता के
प्रचार में हस्तक्षेप नहीं होगा।य्
इससे यह पता चलता है कि हिंदू मत स्वतंत्रता के पक्ष में नहीं है, बल्कि डोमीनियन स्टेटस के पक्ष में है। कुछ लोग इस बात पर आपत्ति करेंगे। यह पूछा जा सकता है कि कांगे्रस के 1927 के प्रस्ताव का क्या हुआ? यह सच है कि कांगे्रस के 1927 के मद्रास अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत निम्नलिखित संकल्प पारित किया गया थाः
फ्यह कांगे्रस भारत के लोगों के लिए पूर्ण राष्ट्रीय स्वतंत्रता का लक्ष्य घोषित
करती है।य्
परंतु दूसरी ओर यह सिद्ध करने के लिए अनेक प्रमाण हैं कि उक्त संकल्प ने कांगे्रस में हिंदुओं के सही मत को नहीं दर्शाया था, और न ही दर्शाता है।
यह संकल्प एक विस्मय की तरह प्रकट हुआ। 1927 में डॉक्टर अंसारी ख्1, के अध्यक्षीय भाषण में इस बात का कोई संकेत नहीं था। स्वागत कमेटी के सभापति
- डॉक्टर अंसारी ने इस विषय पर अपने भाषण में कहाः- फ्संविधान का अंतिम प्रारूप जैसा भी हो,
एक बात कुछ निश्चिंतता से कही जा सकती है कि संविधान संघीय ढांचे पर होगा, जिसमें भारतीय
संयुक्त राज्य का प्रावधान होगा, जिसमें भारत के वर्तमान राज्य संघ की स्वायत्त इकाईयां होंगी और देश
की सुरक्षा में, विदेश-नीति के नियंत्रण में और अन्य सामान्य हित की बातों में उनका यथेष्ट योगदान
रहेगा।य् इंडियन क्वार्टरली रजिस्टर-1927, भाग 2, पृ. 372