286 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
ने एक जरूरी कार्य के रूप में नहीं बल्कि एक सम्भावित कार्य के रूप में इस बात का हल्का-सा जिक्र किया था। ख्1,
इस संकल्प के बारे में कोई पूर्व विचार नहीं किया गया था। यह संकल्प एक चाल का परिणाम था और इसकी सफलता के तीन कारण थे।
प्रथम, उस समय कांगे्रस में एक ऐसा वर्ग था जो पंडित मोतीलाल नेहरू और श्री गांधी के, विशेषकर पंडित मोतीलाल नेहरू के, अधिक प्रभावशाली होने के विरुद्ध था। इस वर्ग का नेतृत्व श्री श्रीनिवास आयंगर करते थे, जो पंडित मोतीलाल नेहरू के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी थे। वे ऐसी योजना की खोज में थे जो पं. मोतीलाल नेहरू और श्री गांधी की ताकत और प्रतिष्ठा को समाप्त कर सके। उन्हें मालूम था कि लोगों को अपनी तरफ करने का एक ही रास्ता है- जातिवाद रवैया अपनाना और यह दिखाना कि उनके प्रतिद्वंद्वी वास्तव में उदारवादी थे, और चूंकि कांगे्रसी उदारता या मध्यमार्ग को पाप समझते थे, उन्होंने सोचा कि उनकी यह योजना अवश्य सफल होगी। उन्होंने भारतीय लक्ष्य को समरभूमि बना दिया, और यह जानते हुए कि पं. मोतीलाल नेहरू और श्री गांधी डोमीनियन का दर्जा चाहते हैं, उन्होंने स्वतंत्रता का लक्ष्य रखा। दूसरी ओर, कांगे्रस में एक अन्य वर्ग था, जिसका नेतृत्व श्री विट्ठलभाई पटेल कर रहे थे। यह वर्ग आयरिश ‘सिन फेन’ पार्टी से संपर्क बनाए हुए था और भारत के हित-साधन में उसके द्वारा सहायता की बात कर रहा था। आयरलैंड की सिनफेन पार्टी कोई भी मदद करने को तब तक तैयार नहीं थी जब तक कि भारतीय पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित न कर दें। यह वर्ग आयरिश सहायता प्राप्त करने के लिए डोमीनियन स्टेटस के लक्ष्य के स्थान पर स्वतंत्रता को लक्ष्य घोषित करने हेतु व्यग्र था। इन दो कारकों में तीसरा कारक भी जुड़ गया और वह था भारत सचिव लार्ड बर्केन्हेड द्वारा साइमन आयोग के गठन के समय दिया गया वक्तव्य जिसमें उन्होंने कटाक्ष किया था कि भारतवासियों में अपना संविधान बनाने की क्षमता नहीं है। इस वक्तव्य को भारतीय राजनीतिज्ञों ने अपना घोर अपमान समझा। इन्हीं तीन कारकों का संयोग इस संकल्प के पारित किए जाने का कारण बना। वस्तुतः जो संकल्प पारित हुआ उसका उद्देश्य देश का राजनीतिक लक्ष्य परिभाषित करने से कहीं अधिक लॉर्ड बर्केन्हेड को ईंट का
- मुत्तुरंगा मुदलियार ने कहाः- फ्हमें यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि यदि संसद अपनी निंद्रालु मुद्रा में
रहती है, तो हमें निश्चित रूप से प्रचार करना होगा। भारत को साम्राज्य से पृथक करने के लिए जब
भी कभी भारतीय राष्ट्रवाद पर जोर देने का समय आएगा, तो भारत के लोगों की मुक्त राष्ट्रवाद की
इच्छा मुखरित होगी, जो कि ब्रिटिश साम्राज्य की सांकेतिक संप्रभुता से भी नहीं दबाई जा सकेगी। ब्रिटिश
राजनेताओं को यही शोभा देता है कि वे इस बात का पूरा ध्यान रखें। उन्हें हमें आक्रोश की दिशा में
नहीं ले जाना चाहिए।य् वही, पृ.-356