288 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
हुआ, जब 1937 में श्री गांधी ने ब्रिटिश लोगों की जानकारी के लिए श्री पोलाक को निम्नलिखित पत्र दिया-
फ्आपका प्रश्न है कि क्या मेरा विचार जो 1931 में गोल मेज सम्मेलन के समय
था अब भी वही है। तब मैंने कहा था, और मैं उसकी पुनरावृत्ति करता हूं,
कि जहां तक मेरा संबंध है, भारत को यदि वेस्ट मिनिस्टर के कानून के तहत
डोमीनियन स्टेटस की भेंट दी जाती है, अर्थात् अपनी इच्छानुकूल अलग होने का
अधिकार, तो मैं उसे बेझिझक स्वीकार करूंगा।य्ऽ
नेहरू रिपोर्ट पर मुस्लिम राजनीतिक संगठनों की घोषणाओं को देखें तो उनके द्वारा बताए गए नामंजूरी के कारण बहुत ही दिलचस्प हैं। ये कारण पूर्णतः अनपेक्षित हैं। निस्संदेह, मुस्लिम लीग जैसे कुछ मुस्लिम संगठनों ने इस रिपोर्ट को इसलिए नामंजूर किया कि इसमें चुनाव में आरक्षण समाप्त करने की सिफारिश की गई थी। परंतु खिलाफत कांफ्रेंस और जमाते-उल-उलेमा द्वारा रिपोर्ट की भर्त्सना का कारण यही नहीं था। ये दोनों मुस्लिम संगठन असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन में कांगे्रस के साथ उसी अग्नि-परीक्षा से गुजरे थे और उनकी अभिव्यक्तियां मुस्लिम समुदाय के विचार को सही राजनीतिक अर्थों में व्यक्त करती थीं।
मौलाना मुहम्मद अली ने कलकत्ता में आयोजित अखिल भारतीय खिलाफत कांफ्रेंस, 1928 में अपने अध्यक्षीय भाषण में नेहरू रिपोर्ट को अस्वीकार करने के कारण बताए। उन्होंने कहाः-
फ्(मैं) भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस का, इसकी कार्यकारिणी समिति का, अखिल
भारतीय मुस्लिम लीग का सदस्य था, और (मैं) खिलाफत कांफ्रेंस में समय
की महत्वपूर्ण राजनीतिक समस्याओं पर (अपने) विचार प्रस्तुत करने आया
हूं, जिन पर सारे मुस्लिम समुदाय को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
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फ्सर्वदलीय सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि भारत को पूर्ण स्वतंत्रता
मिलनी चाहिए और इसमें कोई संप्रदायवाद नहीं है। फिर भी उनका हर
ऽ टाइम्स ऑफ इंडिया, 1-2-37। इस पृष्ठभूमि में 20 मार्च, 1937 को दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन
में, जिसमें नए संविधान के तहत राज्य विधानसभाओं के चुने हुए सदस्य थे, स्वतंत्रता के हक में की
गई घोषणा का कोई महत्व नहीं रह जाता। परंतु गांधी जी के भारत छोड़ो आंदोलन शुरू करने से यह
कहा जा सकता है कि अब वह स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं।