12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 299

290 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

अस्वीकार किया, जिसमें संघीय संविधान के बजाए एकात्मक संविधान का सुझाव दिया गया था। इसके अलावा, जब लाहौर अधिवेशन के उपरांत कांगे्रस ने महात्मा गांधी के कहने पर नेहरू रिपोर्ट को रावी नदी के तट पर दफनाने की घोषणा की और संपूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया, दिल्ली की जमात-उल-उलेमा कांगे्रस के साथ और उसके सविनय अवज्ञा आंदोलन के कार्यक्रम में सहयोग करने के लिए आगे आई, क्योंकि स्वाधीनता-संग्राम में भाग लेना प्रत्येक भारतीय, हिंदू या मुस्लिम, का कर्तव्य था।

फ्परंतु दुर्भाग्य से गांधी जी अपने वचन से मुकर गए और (1) जब वे अभी जेल में ही थे, उन्होंने ब्रिटिश पत्रकार श्री स्लोकोम्बी को बताया कि पूर्ण स्वतंत्रता से उनका अभिप्राय केवल स्वतंत्रता के सार से था। (2) इसके अलावा, जब उन्हें उनके समझौते की मंशा पर रिहा किया गया तो उन्होंने ‘पूर्ण स्वाधीनता’ के स्थान पर, भ्रमित करने वाले शब्दों ‘पूर्ण स्वराज’ का प्रयोग किया और यह साफ घोषणा की कि ब्रिटेन से संबंध-विच्छेद करने का कोई प्रश्न ही नहीं है, और (3) लार्ड इर्विन से गुप्त समझौता करके उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के तहत डोमीनियन स्टेटस का आदर्श स्पष्ट रूप से अंगीकार किया।

फ्गांधी जी द्वारा अपना मोर्चा बदलने पर दिल्ली की जमाते-उल-उलेमा को आंख मूंदकर महात्मा को सहयोग नहीं देना चाहिए था और नेहरू रिपोर्ट की ही तरह कांगे्रस कार्यकारिणी समिति के उस सूत्र को नामंजूर कर देना चाहिए था, जिसके द्वारा नेहरू रिपोर्ट को बम्बई में पुनर्जीवित करने के प्रयास किए गए थे।

फ्परंतु हमें नहीं मालूम कि वे कौन से अघोषित कारण थे, जिनकी वजह से दिल्ली की जमाते-उल-उलेमा को ‘पूर्ण स्वराज’ के आदर्श को अपनाना पड़ा - यह जानते हुए भी कि इसका अभिप्राय पूर्ण स्वतंत्रता न होकर उससे भी खराब हो सकता है। इस मत को अपनाने के लिए एक ही वजह बताई गई कि यद्यपि गांधी जी ने डोमीनियन स्टेटस का दर्जा स्वीकार कर लिया है, वे अब भी इस बात पर बल देते हैं कि ब्रिटेन द्वारा भारतीयों को ब्रिटिश साम्राज्य से पृथक होने का अधिकार दे दिया जाना चाहिए।

फ्यद्यपि यह स्पष्ट है कि इस अधिकार पर जोर देना पूर्व घोषित ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ से ज्यादा महत्व नहीं रखता, दूसरे शब्दों में, जिस तरह