राष्ट्रीय कुंठा
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गांधी जी ने पूर्ण स्वतंत्रता पर केवल इसलिए जोर दिया कि ब्रिटिश सरकार डोमीनियन स्टेटस देने को तैयार हो जाएगी, जो कि महात्मा का एकमात्र चरम लक्ष्य था, उसी तरह कांगे्रस के नेताओं ने पृथकता के अधिकार पर जोर दिया, ताकि वे अंगे्रज से इस उद्देश्य से ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक अधिकार हासिल कर सकें जो कि ब्रिटिश लोगों को एक हद तक ही अप्रसन्न कर सकेंगे। अन्यथा, गांधी जी और उनके अनुयायी इस बात को भली-भांति जानते हैं कि यदि पृथकता का अधिकार भारतीयों को दे भी दिया गया, तो यह कभी अमल में नहीं लाया जाएगा।
फ्यदि कोई मेरी इस अवधारणा को संदेह पर आधारित मानता है और कहता है कि कांगे्रस जब कभी जरूरी समझेगी साम्राज्य से पृथक होने की घोषणा अवश्य करेगी, तो मैं उससे पूछूंगा कि अंगे्रजों के जाने के बाद भारत सरकार का स्वरूप क्या होगा। यह साफ है कि कोई भी तानाशाही स्वरूप की कल्पना नहीं कर सकता, और प्रजातांत्रिक स्वरूप चाहे वह एकात्मक हो या संघीय, हिंदू राज्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं होगा, जिसे मुसलमान किसी भी स्थिति में नहीं स्वीकारेंगे। अब केवल एक ही स्वरूप रहता है, अर्थात् ब्रिटिश साम्राज्य से पूर्ण संबंध-विच्छेद, और संयुत्तQ राज्य अमरीका या सोवियत संघ के आधार पर भारत अपने स्वायत्त राज्यों को मिलाकर एक अपकेंद्रीय जनतांत्रिक सरकार बने। परंतु यह महासभाई कांगे्रस को या ब्रिटिश पे्रमी महात्मा गांधी को कभी स्वीकार्य नहीं होगा।
फ्इस तरह, पूर्ण स्वतंत्रता से अलग होकर दिल्ली की जमाते-उल-उलेमा ने अपने हाथ खींचकर परितोष कर लिया है, परंतु ईश्वर का शुक्र है कि कानपुर, लखनऊ, बदायूं, इत्यादि के उलेमा अब भी दृढ़प्रतिज्ञा हैं और ईश्वर ने चाहा तो आगे भी रहेंगे। कुछ कमजोर लोग इस महान आदर्श के विरोध में कहते हैं कि जब यह संभव ही नहीं है, तो फिर इस पर चर्चा करने का क्या लाभ। हम उनसे कहते हैं कि यह बिल्कुल भी अनुचित नहीं है, बल्कि नितांत आवश्यक है, क्योंकि यदि किसी महान आदर्श को अपना लक्ष्य बना कर न रखा जाये, तो यह विस्मृति के गर्त में चला जाएगा।
हमें डोमीनियन स्टेटस का हर स्थिति में विरोध करना है, क्योंकि यह रास्ते का कोई पड़ाव नहीं है और न ही हमारे लक्ष्य का हिस्सा है,