12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 301

292 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

बल्कि उसका प्रतिकारी या प्रतिद्वंद्वी है। यदि गांधी जी इंग्लैंड पहुंचते हैं

और गोलमेज सम्मेलन सफल हो जाता है और भारत को सुरक्षा-उपायों

सहित, या इनके बिना, किसी भी प्रकार के डोमीनियन स्टेटस का दर्जा

मिल जाता है तो स्वतंत्रता की अवधारणा पूर्णतया विलीन हो जाएगी या

आने वाले समय तक इस ओर ध्यान नहीं जाएगा।य् ख्1,

ऑल इंडिया खिलाफत कांफे्रंस तथा जमानते-उल-उमेला निश्चित रूप से उग्रवादी संगठन थे, और पक्के तौर पर ब्रिटिश विरोधी थे। परंतु ऑल इंडिया मुस्लिम कांफ्रेंस किसी भी प्रकार से उग्रवादी या ब्रिटिश विरोधी मुस्लिम संगठन नहीं था। लेकिन इसकी उत्तर प्रदेश शाखा ने 4 नवंबर, 1928 को अपने कानपुर अधिवेशन में निम्नलिखित प्रस्ताव पारित कियाः

फ्सर्वदलीय यू.पी. मुस्लिम कांफे्रंस का यह मत है कि भारत के मुसलमान

पूर्ण स्वतंत्रता के लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो कि अवश्य ही संघीय

गणतंत्र का स्वरूप होगा।य्

प्रस्तावक के मतानुसार, इस्लाम ने हमेशा स्वाधीनता की शिक्षा दी है, इसलिए भारत के मुसलमान यदि संपूर्ण स्वतंत्रता के विरुद्ध गए, तो वे अपने कर्तव्य से विमुख हो जाएंगें। वक्ता को विश्वास था कि भारत के मुसलमान गरीब हैं, फिर भी दुनिया के लोगों की तुलना में इस्लाम की निष्ठा में वे सबसे आगे हैं।

इस सम्मेलन में एक रोचक घटना ख्2, हुई, जब विषय-समिति में मौलाना आज़ाद सुभानी ने यह प्रस्ताव किया कि सम्मेलन को पूर्ण स्वराज के पक्ष में घोषणा करनी चाहिए।

खान बहादुर मसूदुल हसन और कुछ अन्य लोगो ने इस तरह की घोषणा का विरोध किया, जो उनके विचार में मुसलमानों के हितों के प्रतिकूल होगी। उस पर अनेक महिलाओं ने पर्दा-दीर्घा से एक लिखित वक्तव्य अध्यक्ष को भेजा जिसमें लिखा था कि यदि पुरुषों में पूर्ण स्वतंत्रता के लिए बोलने का साहस नहीं है तो महिलाएं पर्दे से बाहर आएंगी और स्वतंत्रता-संग्राम में हिस्सा लेंगी।

III

चरम लक्ष्य में इन सब मतभेदों के बावजूद, हिंदुओं और मुसलमानों को जबरदस्ती एक देश में रहने का प्रयास किया गया, जैसे कि वे एक ही हों, एक ही संविधान

  1. इंडियन क्वार्टरली रजिस्टर, 1931, भाग 2, पृ. 238-239

  2. इंडियन क्वार्टरली रजिस्टर, 1931, भाग 2, पृ. 425