12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 302

राष्ट्रीय कुंठा

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के राजनीतिक बंधनों से बंधे हों। यह मान भी लिया जाए कि यह हो गया, और किसी तरह मुसलमानों को इस बात पर राजी कर लिया गया तो भी इस बात की क्या गारंटी है कि संविधान निष्प्रभावी नहीं होगा?

किसी संसदीय प्रणाली वाली सरकार के सफलतापूर्वक कार्य-निर्वहन के लिए कुछ निश्चित बातों का होना जरूरी होता है। इन बातों के होने पर ही संसदीय प्रणाली की जड़ें जम सकती हैं। ऐसी ही एक बात की ओर स्वर्गीय लॉर्ड बेलफोर ने, जबकि 1925 में वे अपनी भतीजी ब्लान्च डुगडिल से अरब के लोगों के राजनीतिक भविष्य के बारे में बात कर रहे थे, इंगित किया है। इस वार्ता के दौरान उन्होंने कहाः

फ्आंशिक रूप से यह ब्रिटिश राष्ट्र की ही भूल है और अमरीका के लोगों

की भूल है, और इस भूल के लिए हम किसी को भी क्षमा नहीं कर

सकते - कि उन राष्ट्रों के दिमाग में प्रतिनिधि सरकार का विचार घुस गया

है जिन्हें जरा भी यह नहीं मालूम है कि इसका आधार क्या है। इसको

स्पष्ट करना कठिन है और ऐंग्लो-सेक्सन जातियां तो यह व्याख्या करने

में बहुत कमजोर हैं। फिर भी हम तो इसे इतनी अच्छी तरह से जानते हैं

कि इसकी व्याख्या करना आवश्यक नहीं समझते। मुझे संदेह है कि तुम

ब्रिटिश संविधान पर लिखी गई किसी पुस्तक में यह बात पाओ कि ब्रिटिश

संसदीय प्रणाली की सरकार का समग्र सार-तत्व इसे कामयाब बनाने की

इच्छा में निहित है। हम यही समझ कर चलते हैं। हमने इस व्यवस्था को

मजबूत करने में सैकड़ों वर्ष लगाए हैं, जो इसी बात पर निर्भर है। यह

विश्वास हम लोगों में इतना गहरा उतर चुका है कि यह हमारी दृष्टि से

ओझल हो चुका है, परंतु अन्य लोगों को यह बात इतनी स्पष्ट नहीं प्रतीत

होती। ये लोग - भारतीय, मिस्री और अन्य - हमारे ज्ञान का अध्ययन

करते हैं। वे हमारे इतिहास, हमारे दर्शन और हमारी राजनीति का अध्ययन

करते हैं। वे हमारे संसदीय तरीकों का अध्ययन करते हैं। परंतु कोई उन्हें

यह नहीं बताता कि इस बिंदु पर हमारे संसदीय दल कृत-संकल्प हो जाते

हैं कि कार्य की गति किसी भी तरह अवरुद्ध नहीं होनी चाहिए_ जैसा कि

विलिंगटन के ड्यूक ने कहा, ‘सम्राट की सरकार चलती रहनी चाहिए।’

किंतु उन लोगों का विचार है कि विपक्ष का कार्य पहिए को रोकना है।

यह सरल है, किंतु सोचनीय है।य्ऽ

जब उनसे पूछा गया कि इंग्लैंड में विरोधी पक्ष सरकारी व्यवस्था को रोकने की सीमा तक क्यों नहीं जाता, उन्होंने कहाः

ऽ डुगडिल्स बेलफोर (हुसिंचन), खंड 2, पृ. 363-64