राष्ट्रीय कुंठा
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ऐसे में मुसलमानों का कर्तव्य क्या होना चाहिए, इस पर मौलाना मुहम्मद अली ने 1921 में कराची के कमिटिंग मजिस्ट्रेट के सामने उन आरोपों का उत्तर दिया था, जिनके आधार पर सरकार ने उन पर मुकदमा चलाया था। इस मुकदमे का आधार ऑल इंडिया खिलाफत काफे्रंस के 8 जुलाई, 1921 में कराची में हुए अधिवेशन में रखा गया एक प्रस्ताव था। अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना मुहम्मद अली ने ही की थी। प्रस्ताव इस प्रकार थाः
फ्यह बैठक स्पष्ट रूप से उद्घोषणा करती है कि वर्तमान परिस्थिति में
यह किसी भी मुसलमान के लिए धार्मिक दृष्टि से गैर-कानूनी है कि
वह ब्रिटिश सेना में बना रहे, या उसमें प्रवेश करे, या दूसरों को उनकी
सेना में जाने के लिए प्रोत्साहित करे। यह सामान्यतः सभी मुसलमानों
और विशेषकर उलेमाओं का कर्तव्य है कि वे यह सुनिश्चित करें कि
इन धार्मिक आदेशों को उन सभी मुसलमानों के, जो सेना में हैं, ध्यान
में लाया जाए।य्
मौलाना मुहम्मद अली और छः अन्य लोगों ख्1, पर भारतीय दंड संहिता की धारा 131 के साथ पठित धारा 120-बी तथा धारा 114 के साथ पठित धारा 505 और धारा 117 के साथ पठित धारा 505 के तहत मुकदमा चलाया गया। मौलाना मुहम्मद अली ने अपने बचाव में कहा ख्2, कि वे अपराधी नहीं हैंः
फ्बहरहाल इस महत्वपूर्ण अभियोग का अभिप्राय क्या है? भारत के हम
मुसलमान या हिन्दू किसकी दोषसिद्धि द्वारा दिशानिर्देशित होने वाले हैं?
एक मुसलमान के तौर पर बोलते हुए, यदि मैं धर्मसम्मत मार्ग से विचलित
होता हूं तो मुझे मेरी गलती का अहसास सिर्फ कुरान शरीफ, या अंतिम
पैगम्बर की प्राधिकृत परम्पराएँ - जिस पर अमन तथा प्रभु का आशीर्वाद -
या मान्यताप्राप्त पहले के या वर्तमान मुस्लिम धर्मोपदेशकों के धार्मिक मत,
जिनकी बुनियाद इस्लामी प्राधिकार के इन दो मूल स्रोतों पर है, कराएंगे।
सरकार ये मुझसे मांग करते हैं कि किस बात के लिए यह जो कि शैतान
कहलाना नहीं चाहती है, आज मुझे दंडित कर रही है।
फ्यदि जिसकी मैं उपेक्षा करता हूं, वह मेरी उपेक्षा से घोर पाप बन
जाए, और यह तब भी अपराध है जब मैं इसकी उपेक्षा नहीं करता हूं, तो
मैं इस देश में स्वयं को कैसे सुरक्षित समझ सकता हूँ?य्
विचित्र बात यह है कि उनमें से एक शारदा पीठ के शंकराचार्य थे।
‘दि ट्रॉयल ऑफ अली ब्रदर्स’, लेखक आर.वी. थंडानी, पृ. 69-71