296 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
फ्मुझे या तो पापी होना चाहिए या अपराधी.......इस्लाम में सिर्फ
एक ही प्रभुसत्ता को माना गया है जो कि सर्वोच्च है और सर्वजनीय है,
अविभाज्य है तथा अत्याज्य है............
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फ्एक मुसलमान, चाहे वह असैनिक हो या सैनिक, चाहे वह
मुस्लिम शासित हो या गैर-मुस्लिम शासन में रह रहा हो, अपनी निष्ठा
अल्लाह में कबूल करने के लिए कुरान के आदेशों को मानता है, उसकी
एक मात्र निष्ठा उसके पैगम्बर और पैगम्बर के उत्तराधिकारियों.......के
प्रति होती है। एकता का यह सिद्धान्त गूढ़ चिन्तकों का कोई गणितीय
फार्मूला नहीं है अपितु, यह शिक्षित या अनपढ़ प्रत्येक मुसलमान की आम
आस्था है।....इससे पहले भी और दूसरे स्थानों पर भी मुसलमान गैर -
मुस्लिम प्रशासन में शांतिपूर्ण प्रजा के रूप में हैं। किंतु एक कठोर नियम
है और सदैव रहा है कि एक मुसलमान के रूप में वे अपने धर्मनिरपेक्ष
शासकों के सिर्फ उन्ही कानूनों तथा आदेशों का पालन करेंगे जिनमें कि
अल्लाह के सर्वोच्च नियमों को माना गया हो। इन बिल्कुल स्पष्ट तथा
पूर्णतः परिभाषित आज्ञापालन की सीमाओं को सिर्फ गैर-मुस्लिम शासन
के प्राधिकार के बाबत ही नहीं निर्दिष्ट किया गया है, अपितु इसके
विपरीत वे सार्वभौमिक रूप से प्रयोज्य हैं तथा किसी भी परिस्थिति में
इनमें कमी-बेशी नहीं की जा सकती है।य्
इससे स्थायी सरकार की कामना करने वाला कोई भी व्यक्ति अत्यधिक भारी आशंका में पड़ जायेगा। किंतु मुस्लिम उसूलों के लिए इसका कोई महत्व नहीं है क्योंकि मुसलमान के लिए कोई देश कब मातृभूमि है तथा कब नहीं है यह बात ये उसूल निर्धारित करते हैं।
मुस्लिम धर्म के सिद्धांतों के अनुसार, विश्व दो हिस्सों में विभाजित है - दार-उल-इस्लाम तथा दार-उल-हर्ब। मुस्लिम शासित देश दार-उल-इस्लाम हैं। वह देश जिसमें मुसलमान सिर्फ रहते हैं न कि उस पर शासन करते हैं, दार-उल-हर्ब है। मुस्लिम धार्मिक कानून का ऐसा होने के कारण भारत हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों की मात्भूमि नहीं हो सकती है। यह मुसलमानों की धरती हो सकती है - किंतु यह हिन्दुओं और मुसलमानों की धरती जिसमें दोनों समानता से रहें नहीं हो सकती। फिर, जब इस पर मुसलमानों का शासन होगा तो यह मुसलमानों की धरती हो सकती है। इस समय यह देश गैर-मुस्लिम सत्ता के प्राधिकार के अंतर्गत है, इसलिए मुसलमानों की धरती नहीं हो सकती। यह देश दार-उल-इस्लाम होने की बजाय दार-उल-हर्ब बन जाता है।