राष्ट्रीय कुंठा
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हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि यह दृष्टिकोण केवल शास्त्रीय है। यह सिद्धांत मुसलमानों को प्रभावित करने में बहुत कारगर कारण हो सकता है। इसका मुसलमानों के व्यवहार पर तब बहुत भारी असर पड़ा, जब अंगे्रजों ने भारत पर अपना अधिकार जमाया। अंगे्रजों के भारत को हथियाने पर हिंदुओं ने कोई बेचैनी नहीं दिखाई। जहां तक मुसलमानों का सवाल था, उन्होंने पूछा कि क्या भारत अब उनके रहने योग्य रह गया है? मुस्लिम समुदाय में इस बारे में एक बहस प्रारंभ हुई और, डॉ. टाइटस के अनुसार, आधी शताब्दी तक चली कि क्या भारत दार-उल-हर्ब है या दार-उल-इस्लाम। कुछ ज्यादा धार्मिकों ने सैयद अहमद के नेतृत्व में, वास्तव में जिहाद का ऐलान किया, मुस्लिम शासित भू भाग पर जाने की (हिजरत) आवश्यकता का उपदेश दिया और (उन्होंने) अपना आंदोलन सारे भारत में चलाया।
अलीगढ़ आंदोलन के सूत्रधार सर सैय्यद अहमद ने भारतीय मुसलमानों को समझाया कि भारत को महज इसलिए कि यह मुस्लिम शासन के बजाय अंगे्रजों के शासन के अधीन है, दार-उल-हर्ब न मानें। उन्होंने मुसलमानों से अनुरोध किया कि वे इसे दार-उल-इस्लाम मानें, क्योकि वे अपने जरूरी रीति-रिवाजों और उत्सवों को अपने धर्मानुसार मनाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। हिजरत के लिए जो आंदोलन चला था, वह फिलहाल विलुप्त हो गया, परंतु भारत दार-उल-हर्ब है, इस सिद्धांत का परित्याग नहीं हुआ। 1920-21 में मुस्लिम देशभक्तों ने फिर से इसका उपदेश देना शुरू कर दिया, जबकि देश में खिलाफत आंदोलन चल रहा था। यह आंदोलन मुस्लिम जनता में निष्प्रभावी नहीं रहा, इसलिए न सिर्फ अनेक मुसलमानों ने मुस्लिम धार्मिक कानून के अनुसार कदम उठाने की उत्कंठा दिखाई, वरन वे अपने घर छोड़कर अफगानिस्तान चले गए।
यह उल्लेखनीय है कि जो मुसलमान अपने आप को दार-उल-हर्ब में पाते हैं, उनके बचाव के लिए हिजरत ही उपाय नहीं है। मुस्लिम धार्मिक कानून की दूसरी आज्ञा जिहाद (धर्मयुद्ध) है, जिसके तहत हर मुसलमान शासक का यह कर्तव्य हो जाता है कि इस्लाम के शासन का तब तक विस्तार करता रहे, जब तक सारी दुनिया मुसलमानों के नियंत्रण में नहीं आ जाती। संसार के दो खेमों में बंटने की वजह से सारे देश या तो दार-उल-इस्लाम (इस्लाम का घर) या दार-उल-हर्ब (युद्ध का घर) की श्रेणी में आते हैं। तकनीकी तौर पर हर मुस्लिम शासक का, जो इसके लिए सक्षम है, कर्तव्य है कि वह दार-उल-हर्ब को दार-उल-इस्लाम में बदल दे_ और भारत में जिस तरह मुसलमानों के हिज़रत का मार्ग अपनाने के उदाहरण हैं, वहां ऐसे भी उदाहरण हैं कि उन्होंने जिहाद की घोषणा करने में संकोच नहीं किया। जिज्ञासु व्यक्ति 1857 के विद्रोह के इतिहास की जांच कर सकता है, और यदि वह ऐसा