298 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
करता है तो उसे मालूम होगा कि आंशिक तौर पर चाहे कुछ भी हो, यह मुसलमानों द्वारा अंगे्रजों के खिलाफ जिहाद की घोषणा ही थी_ और वह बगावत, जहां तक मुसलमानों का संबंध था, विद्रोह की पुनरावृत्ति थी जो सैयद अहमद ने मुसलमानों में दशकों तक यह कहकर पैदा कर दी थी कि अंगे्रज के कब्जा करने से भारत दार-उल-हर्ब बन गया था। भारत को दार-उल-हर्ब से दार-उल-इस्लाम में बदलने की वह बगावत मुसलमानों की एक कोशिश थी। एक और अधिक निकटवर्ती उदाहरण है 1919 में अफगानिस्तान का भारत पर आक्रमण। यह उन भारतीय मुसलमानों द्वारा सुनियोजित था, जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के प्रति खिलाफतियों की विरोध की भावना से पे्ररित होकर भारत को स्वतंत्र करने के लिए अफगानिस्तान की सहायता मांगी थी।ऽ उस आक्रमण से भारत को स्वतंत्रता मिलती या दासता, यह कहना असंभव है, क्योंकि आक्रमण नहीं हो सका। इसके अलावा, तथ्य यह है कि भारत, चाहे एकमात्र मुस्लिम शासन के अधीन न हो, दार-उल-हर्ब है, और इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार मुसलमानों द्वारा जिहाद की घोषणा करना न्यायसंगत है।
वे जिहाद की घोषणा ही नहीं कर सकते, बल्कि उसकी सफलता के लिए विदेशी मुस्लिम शक्ति की मदद भी ले सकते हैं, और यदि विदेशी मुस्लिम शक्ति जिहाद की घोषणा करना चाहती है तो उसकी सफलता के लिए सहायता दे सकते हैं। श्री मुहम्मद अली ने सेशन कोर्ट में जूरी के समक्ष बयान में इस बात का स्पष्टीकरण दिया था। श्री अली ने कहाः
फ्लेकिन चूंकि सरकार को हमारे धार्मिक विश्वासों के हमारे उन क्रियाकलापों
पर पड़ने वाले प्रभाव की, जिन्हें हम सुविधा की दृष्टि से सांसारिक कहते
हैं, बिल्कुल जानकारी नहीं है, इसलिए एक बात साफ करनी आवश्यक
है, और वह यह है कि इस्लाम में आस्था रखने वालों को इस्लाम यह
अनुमति नहीं देता कि वे दूसरे व्यक्ति के खिलाफ बिना किसी पुख्ता सबूत
के निर्णय दें, और हम वास्तव में अपने मुस्लिम भाई के विरुद्ध नहीं लड़
सकते, जब तक यह निश्चित न हो जाए कि वह अकारण आक्रमण और
अपनी आस्था की सुरक्षा के लिए न लड़ने का दोषी हो। (यह 1919 के
युद्ध के परिपे्रक्ष्य में था जो ब्रिटेन और अफगानिस्तान के मध्य चल रहा था)
अब हमारी स्थिति यह है कि अमीर की दुर्भावना या पागलपन के सबूत के
अभाव में हम कदापि नहीं चाहते कि भारत के सैनिक, मुसलमान सहित,
अपनी सहायता और प्रोत्साहन से अफगानिस्तान पर आक्रमण करके पहले
उस पर कब्जा करें और फिर झंझट और व्याकुलता के शिकार हो जाएं।
ऽ इस रोचक, लेकिन भयंकर, घटना की विस्तार से जांच की गई है जिसमें श्री गांधी ने श्री कारंदीकर द्व
ारा प्रकाशित पत्र में लेख लिखकर भूमिका निभाई।