300 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
एक मुसलमान की आस्था में सिर्फ इतना ही नहीं है कि वह सिद्धान्तों
में विश्वास करे और उस आस्था पर स्वयं खरा उतरे, अपितु उसे अपनी
पूरी शक्ति से, निस्संदेह बिना विवश किए हुए, इस लक्ष्य की ओर प्रयास
करना चाहिए कि दूसरे भी विहित आस्था तथा प्रथाओं को मानने लगे।
पवित्र कुरान में इसे अमरिबिलमारूफ और नाही अनिलमुनकार कहा गया
है_ और पवित्र पैगम्बर की परम्पराओं के कतिपय दूसरे अध्याय इस्लाम के
इस अति महत्वपूर्ण सिद्धांत से संबंधित हैं। एक मुसलमान यह नहीं कह
सकता कि ‘मैं अपने भाई का रखवाला नहीं हूँ’ क्योंकि एक तरह से वह
उसका रखवाला है, और उसकी अपनी मुक्ति तब तक सुनिश्चित नहीं की
जा सकती जब तक कि वह दूसरों को अच्छाई करने के लिए प्रोत्साहित
तथा बुराई करने से हतोत्साहित नहीं करता है। इसलिए यदि कोई मुसलमान
इस्लाम के मुजाहिद के विरुद्ध युद्ध छेड़ने को बाध्य किया जाता है तो
उसे न सिर्फ स्वयं इस पर ऐतराज करना चाहिए, अपितु यदि वह अपनी
मुक्ति को महत्व देता है तो, उसे अन्य भाइयों को भी इस उद्देश्य के लिए
अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए पे्ररित करना चाहिए और ऐसा हुए
बिना मुक्ति की आशा नहीं की जा सकती। यह हमारी आस्था और प्रत्येक
मुसलमान की आस्था है तथा हम अत्यन्त ही विनम्रतापूर्वक इसे साकार
करना चाहते हैं, और यदि हमें इस सिद्धांत का प्रचार करने की स्वतंत्रता
नहीं दी गई तो हमें यह समझना चाहिए कि जिस धरती पर यह आजादी
नहीं है वह इस्लाम के लिए सुरक्षित नहीं है।य्
यह अखिल-इस्लामबाद का आधार है। यही है जो भारत में प्रत्येक मुसलमान को यह कहने के लिए कि वह मुसलमान पहले है तथा उसके बाद भारतीय है, पे्ररित करता है। इसी भावना के कारण भारतीय मुसलमानों ने भारत की प्रगति में बहुत छोटी भूमिका निभाई तथा मुस्लिम देशों के लिए अपनी शक्ति व्यर्थ ख्1, कर दी क्योंकि एक मुसलमान की सोच में मुस्लिम देशों का स्थान पहला है तथा भारत का स्थान दूसरा है।
महामहिम आगा खाँ यह कह इसका औचित्य सिद्ध करते हैं ख्2, ः-
फ्यह एक सही और वैध अखिल-इस्लामवाद है और प्रत्येक सच्चा तथा
आस्थावान मुसलमान इसका अंग है - यह पैगम्बर की संतान के आध्यात्मिक
भाईचारे तथा एकता का सिद्धांत है। यह फारसी-अरबी संस्कृति और सभ्यता
के उस महान परिवार का, जिसे हमने पहले अध्याय में इस्लाम कहा
- 1912 जब प्रथम बाल्कन युद्ध शुरू हुआ था और 1922 में जब तुर्की ने यूरोप के साथ शांति समझौता
किया था उसके बीच भारतीय मुसलमान भारत की राजनीति की थोड़ा भी परवाह नहीं करते थे। वे पूरी
तरह तुर्की तथा अरब के भविष्य के बारे में सोच रहे थे।
- इंडिया इन ट्रांजिशन पृ. 157