राष्ट्रीय कुंठा
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है, गहरा और चिरस्थायी तत्व है। यह चीन से लेकर मोरक्को तक तथा वोल्गा से लेकर सिंगापुर तक सर्वत्र सह-आस्थावानों के प्रति धर्मार्थ और सदेच्छा का पर्याय है। इसका अभिप्राय इस्लाम के साहित्य, उसकी अतिसुंदर कलाकृतियों, उसके भव्य स्थापत्य, उसके मोहक काव्यों में शाश्वत अभिरुचि है। इसका अभिप्राय सच्चा सुधार - धर्म की प्राचीन और शुद्ध सरलता की ओर वापसी, आग्रह और तर्क से इसका प्रचार-प्रसार, व्यक्तिगत जीवन में आध्यात्मिक शक्ति का अभिव्यक्तिकरण, मानवता के लिए लाभकारी कार्य - भी है। सहज और बहुमूल्य आध्यात्मिक आंदोलन न सिर्फ गुरू और उसकी शिक्षाओं को अपितु सभी क्षेत्रों के उसकी संतान को तुर्की या अफगानी, भारतीय या मिस्री के प्रति स्नेह का पात्र बनाता है। काशगर या सेराजेवों के मुस्लिम क्षेत्रों में अकाल या विध्वंसकारी आग शीघ्र ही दिल्ली या मिस्र के मुसलमानों की सहानुभूति तथा भौतिक सहायता अर्जित कर लेते हैं। इस्लाम के वास्तविक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकता को सदैव बढ़ते जाना चाहिए क्योंकि पैगम्बर के अनुयायी के लिए यह जीवन और आत्मा की बुनियाद है।य्
यदि आध्यात्मिक अखिल-इस्लामवाद राजनीतिक अखिल-इस्लामवाद के रूप में उभरे तो इसे असहज नहीं कहा जा सकता। शायद यही अनुभूति आगा खान के मस्तिष्क में थी, जब उन्होंने कहाः
फ्भारतीय देशभक्त को यह समझ लेना चाहिए कि फारस, अफगानिस्तान और संभवतः अरब, देर-सबेर किसी महाद्विपीय शक्ति की परिधि में आजाएंगे - जैसे कि जर्मनी की, या जो शक्ति रूस के छिन्न-भिन्न होने से उत्पन्न हो उसकी अन्यथा उन्हें अपनी नियति भारतीय साम्राज्य के साथ रखनी चाहिए, जिससे उनका इतना अभिन्न संबंध है। विश्व की वे शक्तियां, जो छोटे राज्यों को शक्तिशाली पड़ोसियों के नजदीक आने को बाध्य कर देती हैं- यद्यपि ऐसा अभी यूरोप में ही नजर आया है - अपरिहार्य रूप से एशिया में अपनी शक्ति का अहसास कराएंगी। जब तक भारत स्वयं पर नजर रखने वाले शक्तिशाली पड़ोसी और संभावित विरोधी राज्य की संभावना को नहीं स्वीकारता और भारी सैनिक बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं होता, तब तक अपने उन पड़ोसी मुसलमान राज्यों की उपेक्षा नहीं कर सकता जिनसे उसके सद्भावनापूर्ण रिश्ते हैं।
संक्षेप में, परोपकारी और प्रगतिशील संघ को संघीय भारत की नींव पर ही आधारित करना होगा, उसकी अपनी ऐतिहासिक विशेषताएं और