302 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
स्वाभाविक हित होंगे, तथा अधिक शक्तिशाली ताकतों के बा“य खतरों और
आर्थिक शोषण से उसकी रक्षा सांझा सुरक्षा प्रणाली एवं आचारों-विचारों
की एकता द्वारा होगी। ऐसा संघात्मक भारत सीलोन (श्रीलंका) को अपनी
प्राकृतिक मां के सीने से लगाएगा, और तदुपरांत वही घटनाक्रम घटेगा,
जिसका वर्णन पहले किया गया है। न्याय, स्वतंत्रता, जाति और प्रत्येक
ऐतिहासिक तथ्य का आदर करते हुए हम व्यापक और गहरी नींव पर एक
महान दक्षिण एशियाई संघ का निर्माण करेंगे।
फ्फारस और अफगानिस्तान की सहायता के लिए एक निष्कपट नीति
निरंतर विकासमान आधुनिक युग की मांग है। भारत के लिए उत्तर-पश्चिम
में दो प्राकृतिक प्राचीरें खड़ी हो जाएंगी, जिसे न तो जर्मन न स्लाव, और न
ही तुर्क और मंगोल कभी ध्वस्त करने की सोच सकेंगे। वे स्वतः ही उस
शक्ति की तरफ खिंचे चले आएंगे, जो उन्हें अपेक्षित स्वस्थ, संघीय भारत
का ढांचा देगी, जिसमें राज्यों को वास्तविक स्वायत्तता हो, जिसमें प्रत्येक
रजवाड़ा आंतरिक स्वतंत्रता से आश्वस्त हो, और बरार सहित हैदराबाद राज्य
निजाम की अधीनता में उदार और पुनर्जीवित हो। वे भारत में स्वतंत्रता,
व्यवस्था, स्वायत्तता परंतु साम्राज्यीय एकता पाएंगे, और अपने आप महासंघ
के लाभों को जानेंगे, और उस महान साम्राज्य की असीम शक्ति से स्वायत्त
और सद्भावनापूर्ण संबंध सुनिश्चित करेंगे, जिसमें कभी सूर्यास्त नही होता।
ब्रिटिश शासन की स्थिति मेसोपोटामिया और अरब में, चाहे इसका कोई भी
स्वरूप हो, मेरे द्वारा समर्थित नीति से निश्चित रूप से मजबूत होगी।य् ख्1,
दक्षिण एशियाई महासंघ अपेक्षाकृत मुस्लिम देशों जैसे अरब, मेसोपोटामिया और अफगानिस्तान के ज्यादा हित में था, बजाए भारत के। ख्2, इससे यह पता चलता है कि भारत के मुसलमानों के विचार भारतीय मुसलमानों को छोड़कर किस प्रकार मुस्लिम देशों के हितों से जुड़े होते हैं।
इंडिया इन ट्रांजिशन, पृ. 169
यदि यह दक्षिण एशियाई महासंघ बन गया होता तो कितनी भयंकर बात होती? हिंदू भयावह अल्पसंख्यक
स्थिति में पहुंच जाते। इंडियन एनुअल रजिस्टर का कथन है - भारतीय मुस्लिम समुदाय के ब्रिटिश
साम्राज्यवाद समर्थक एक एंगोला मुस्लिम गठबंधन के माध्यम से ब्रिटेन के शासन को दक्षिणा एशिया
में अरब से मलाया द्वीप समूह तक स्थिर बनाने में संक्रिय रहे हैं (यह सोचकर कि) इसमें मुसलमान
भले ही कनिष्ठ भागीदार हो, लेकिन समय आने पर वरिष्ठ भागीदार बन जाएंगे। इस तरह की भावना
और पूर्वाभास में हमें उस स्कीम के संकेत मिलते हैं, जो आगा खां की युद्ध हाल में प्रकाशित पुस्तक
‘इंडिया इन ट्रांजिसन’ में उल्लिखित है। इस स्कीम के तहत यह योजना बनाई गई थी कि दक्षिण-पश्चिम
एशियाई महासंघ की स्थापना की जाए भारत जिसमें एक संघटक इकाई हो। युद्ध के बाद जब श्री विसटन
चर्चिल ब्रिटिश कैबिनेट में उपनिवेशों के राज्य सचिव थे, तो उन्हें मध्यपूर्व विभाग के अभिलेखागार में
मध्य-पूर्वी साम्राज्य के लिए एक बनी बनाई स्कीम मिली - मध्य-पूर्व साम्राज्य-1938, इंडिया इन होम
पोलिसी, भाग 2, पृ. 48।