12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 313

304 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

सरकारी सत्ता की आज्ञा का पालन करने की इच्छा सरकार की स्थिरता के लिए उतनी ही आवश्यक है, जितनी राज्य के मौलिक तत्वों पर राजनीतिक पार्टियों की एकता। राज्य को कायम रखने में आज्ञापालन के महत्व पर आपत्ति करना किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति के लिए असंभव है। सविनय अवज्ञा में विश्वास का तात्पर्य है अराजकता में विश्वास करना।

हिंदुओं से नियंत्रित एवं शासित सरकार की सत्ता को मुसलमान किस सीमा तक स्वीकार करेंगे, इस प्रश्न के उत्तर के लिए ज्यादा छानबीन करने की आवश्यकता नहीं है। मुसलमानों के लिए हिंदू ‘काफिर’ ख्1, हैं, और एक काफिर सम्मान के योग्य नहीं है। वह निम्न कुल में जन्मा होता है, और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नही होती। इसलिए जिस देश में काफिरों का शासन हो, वह मुसलमानों के लिए दार-उल-हर्ब है। ऐसी स्थिति में यह साबित करने के लिए और सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिंदू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे। सम्मान और सहानुभूति जैसी बुनियादी भावनाएं, जो किसी सरकार की सत्ता के अनुपालन के लिए मनुष्य को पहले से ही पे्ररित करती हैं, वे तो विद्यमान ही नहीं हैं। किंतु यदि साक्ष्य चाहिए तो उनकी कोई कमी नहीं है। यह इतनी बहुलता में हैं कि यही तय करना समस्या हो जाती है कि किसे रखा जाए और किसे छोड़ दिया जाए?

खिलाफत आंदोलन के दौरान जब मुसलमान की मदद के लिए हिंदू काफी कुछ कर रहे थे, तब भी मुसलमान यह नहीं भूले थे कि उनकी तुलना में हिंदू निम्न और घटिया कौम है। एक मुसलमान ने खिलाफत के समाचार पत्र ‘इंसाफ’ में लिखा ख्2, ः

फ्स्वामीय् और ‘महात्मा’ का अर्थ क्या है? क्या मुसलमान अपने भाषणों

या लेखों में गैर-मुस्लिम के लिए इन शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं? उसका

कहना है कि ‘स्वामी’ का मतलब है, ‘मास्टर’ और ‘महात्मा’ का तात्पर्य

है, ‘वह व्यक्ति जिसे सर्वोच्च आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त है’, अर्थात् वह

रूह-ए-आज़म के समान है और सर्वोच्च आत्मा है।य्

उन्होंने उलेमाओं से कहा कि वे एक निर्णायक फतवा जारी करें कि क्या उनके लिए गैर-मुसलमानों को ऐसी सम्मानजनक और आदरसूचक पदवियों से संबोधित करना न्यायसंगत है।

  1. हिंदूओं को काफिर कहे जाने पर उन्हें बुरा मानने या आहत महसूस करने की आवश्यकता नहीं है,

क्योंकि वे भी मुसलमानों को म्लेच्छ कहते हैं, जिसका अर्थ है ऐसा व्यक्ति जो संपर्क करने के योग्य

नहीं है।

  1. देखें, थ्रू इंडियन आइज़, टाइम्पस ऑफ इंडिया, दिनांक, 11-3-1924